अनुकंपा नियुक्ति के लिए पत्नी का अधिकार भाई से ऊपर, उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की मांग गलत: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए मृतक कर्मचारी की पत्नी का अधिकार अन्य रिश्तेदारों, विशेषकर भाई, से ऊपर है। कोर्ट ने कहा कि जब नीति स्पष्ट रूप से पत्नी को प्राथमिकता देती है, तो विभाग केवल इसलिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) की मांग नहीं कर सकता कि मृतक के भाई ने भी आवेदन किया है।

जस्टिस जय कुमार पिल्लई की पीठ ने मध्य प्रदेश राज्य कृषि विपणन बोर्ड के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक विधवा से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र लाने को कहा गया था क्योंकि उसके देवर (मृतक के भाई) ने भी नौकरी के लिए दावा पेश किया था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता श्रीमती मनीषा ने हाईकोर्ट में मध्य प्रदेश राज्य कृषि विपणन बोर्ड द्वारा 30 दिसंबर, 2024 को जारी आदेश को चुनौती दी थी। उनके पति, स्वर्गीय श्री जितेंद्र सोलंकी, कृषि उपज मंडी समिति, धार में सहायक उप-निरीक्षक के पद पर कार्यरत थे। 12 नवंबर, 2023 को उनका निधन हो गया था।

पति की मृत्यु के बाद, श्रीमती मनीषा ने राज्य सरकार की 29 सितंबर, 2014 की नीति के तहत अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। इसके बाद, मृतक के छोटे भाई, श्री महेंद्र सोलंकी ने भी नियुक्ति के लिए आवेदन प्रस्तुत कर दिया।

विभाग ने “प्रतिस्पर्धी दावों” का हवाला देते हुए श्रीमती मनीषा को सक्षम न्यायालय से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र लाने का निर्देश दिया। इसके खिलाफ मनीषा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, यह तर्क देते हुए कि कानूनी रूप से विवाहित पत्नी होने के नाते उनका पहला अधिकार है और प्रमाण पत्र की मांग मनमानी है।

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कोर्ट के समक्ष तर्क

याचिकाकर्ता का पक्ष: याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्री विजय कुमार पटवारी ने तर्क दिया कि अनुकंपा नियुक्ति नीति के तहत पत्नी को विचार किए जाने का प्रथम अधिकार प्राप्त है। उन्होंने कहा कि नीति में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो एक विवाहित मृतक कर्मचारी के छोटे भाई को अनुकंपा नियुक्ति का पात्र बनाता हो। अतः, उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की जिद करना “मनमाना, अवैध और नीति के विपरीत” है, विशेष रूप से तब जब पत्नी के रूप में याचिकाकर्ता की स्थिति पर कोई विवाद नहीं है।

प्रतिवादियों का पक्ष: राज्य की ओर से अधिवक्ता सुश्री स्वाति उखले और बोर्ड की ओर से अधिवक्ता श्री अभिनव धनोदकर ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि अनुकंपा नियुक्ति कोई निहित अधिकार नहीं है बल्कि एक अपवाद है। उन्होंने कहा कि पत्नी और भाई के बीच “प्रतिस्पर्धी दावों” के कारण, भविष्य के विवादों से बचने के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र मांगना नीति के क्लॉज 2.7 के तहत एक “सद्भावनापूर्ण प्रशासनिक कदम” था। उन्होंने स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश बनाम शशि कुमार (2019) के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

कोर्ट ने 29 सितंबर, 2014 की अनुकंपा नियुक्ति नीति, विशेष रूप से क्लॉज 2.1, 2.6 और 2.7 का विस्तृत विश्लेषण किया।

प्राथमिकता के प्रश्न पर: कोर्ट ने नोट किया कि क्लॉज 2.1 में मृतक शासकीय सेवक की पत्नी को प्राथमिकता क्रम में पहले स्थान पर रखा गया है। इसके विपरीत, क्लॉज 2.6 स्पष्ट करता है कि भाई पर विचार केवल तभी किया जा सकता है जब मृतक शासकीय सेवक अविवाहित हो।

जस्टिस पिल्लई ने टिप्पणी की:

“क्लॉज 2.1 और क्लॉज 2.6 पर उचित विचार करने पर, यह स्पष्ट हो जाता है कि मृतक शासकीय सेवक की पत्नी अनुकंपा नियुक्ति के लिए पहली और सर्वोच्च प्राथमिकता रखती है। क्लॉज 2.6, जो भाई के विचार के लिए प्रावधान करता है, स्पष्ट रूप से उन मामलों तक सीमित है जहां मृतक शासकीय सेवक अविवाहित था।”

भाई के दावे की वैधता पर: कोर्ट ने कहा कि चूंकि यह निर्विवाद है कि मृतक का विवाह याचिकाकर्ता से हुआ था, इसलिए भाई का आवेदन “नीति के तहत कानूनी रूप से कोई प्रतिस्पर्धी अधिकार नहीं बनाता है।”

उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की आवश्यकता पर: प्रतिवादियों ने अपनी मांग को सही ठहराने के लिए नीति के क्लॉज 2.7 का सहारा लिया था। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्लॉज 2.7 केवल तब लागू होता है जब मृतक के पति या पत्नी में से कोई भी जीवित न हो।

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कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

“इस न्यायालय के सुविचारित मत में, अनुकंपा नियुक्ति के संदर्भ में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की मांग करना अनुचित (Misplaced) है… जहाँ नीति स्वयं पात्र आश्रित और प्राथमिकता के क्रम को स्पष्ट रूप से पहचानती है, वहां प्रशासनिक प्राधिकरण उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जैसी अतिरिक्त आवश्यकता को नहीं थोप सकता, जिसका प्रभाव नीति के उद्देश्य को विफल करने या विलंबित करने का हो।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 30 दिसंबर, 2024 के विवादित आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि उक्त आदेश जारी करते समय शासी नीति पर ध्यान नहीं दिया गया।

प्रतिवादी अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे याचिकाकर्ता के आवेदन पर “उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जमा करने की जिद किए बिना, 29/09/2014 की अनुकंपा नियुक्ति नीति के अनुसार सख्ती से, शीघ्रता से और कानून के अनुसार” विचार करें।

इस आदेश का पालन 60 दिनों के भीतर सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: श्रीमती मनीषा बनाम मध्य प्रदेश राज्य कृषि विपणन बोर्ड और अन्य
  • केस नंबर: डब्ल्यूपी नंबर 5454/2025
  • कोरम: जस्टिस जय कुमार पिल्लई

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