अरब स्प्रिंग जैसी नारेबाज़ी से जेनरेशन Z को भड़काने की कोशिश की: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में सोनम वांगचुक की एनएसए हिरासत को बताया जायज़

केंद्र सरकार और लद्दाख प्रशासन ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत की गई गिरफ्तारी को सही ठहराते हुए कहा कि उन्होंने नेपाल, बांग्लादेश और अरब देशों जैसी ‘जन आंदोलनों’ की बात कर युवाओं को भड़काने की कोशिश की।

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पीवी वराले की पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वांगचुक ने “सोची-समझी रणनीति” के तहत जेनरेशन Z को भड़काने का प्रयास किया और अपनी असली मंशा को गांधी जी के भाषणों के हवाले से ढकने की कोशिश की।

“उन्होंने ‘हम’ बनाम ‘वे’ की भाषा का इस्तेमाल किया, जनमत संग्रह और रेफरेंडम जैसे शब्दों का ज़िक्र किया—जैसे शब्द पहले जम्मू-कश्मीर में उठाए गए थे। यह सब युवा वर्ग को गुमराह करने और अलगाव की भावना पैदा करने के लिए किया गया,” मेहता ने कहा।

मेहता ने कहा कि लद्दाख एक संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र है, जो पाकिस्तान और चीन दोनों से सटा हुआ है। “लद्दाख हमारे सुरक्षा बलों की आपूर्ति श्रृंखला के लिए अहम है। वहां की शांति भंग करने की कोई भी कोशिश राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है,” उन्होंने कहा।

उन्होंने यह भी कहा कि जिला मजिस्ट्रेट द्वारा NSA के तहत वांगचुक की हिरासत का आदेश स्वतंत्र रूप से दिए गए साक्ष्यों पर आधारित है, न कि किसी “उधार लिए गए” या मनगढंत सामग्री पर।

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“यह तर्क ही त्रुटिपूर्ण है कि मजिस्ट्रेट को हर भाषण स्थल पर जाकर स्वयं सुनना चाहिए। अधिकारियों ने भाषणों की रिकॉर्डिंग की और सामग्री के आधार पर आदेश पारित किया गया,” मेहता ने पीठ को बताया।

वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे अंगमो ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के माध्यम से दलील दी कि वांगचुक की गिरफ्तारी न केवल मनमानी है बल्कि संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन भी है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने कुछ चुने हुए वीडियो और “उधार की गई सामग्री” का उपयोग कर जिला मजिस्ट्रेट को गुमराह किया।

वांगचुक, जो फिलहाल जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद हैं, ने पहले ही अदालत में स्पष्ट किया है कि उन्होंने कभी भी हिंसा या सरकार को उखाड़ फेंकने जैसी कोई अपील नहीं की। उन्होंने 29 जनवरी को कहा था कि वे शांतिपूर्ण विरोध का संवैधानिक अधिकार रखते हैं और किसी भी प्रकार की हिंसा के खिलाफ हैं।

यह मामला 24 सितंबर 2025 को लद्दाख में हुए हिंसक प्रदर्शन के बाद उठा, जिसमें राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची के तहत विशेष संरक्षण की मांग की गई थी। उस दिन की हिंसा में चार लोगों की मौत हुई और 90 से अधिक घायल हुए थे। इसके दो दिन बाद वांगचुक को NSA के तहत हिरासत में लिया गया।

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अंगमो की याचिका में दावा किया गया है कि वांगचुक ने हिंसा की निंदा की थी और सोशल मीडिया पर कहा था कि “हिंसा लद्दाख की तपस्या और शांतिपूर्ण आंदोलन को विफल कर देगी। यह उनके जीवन का सबसे दुखद दिन था।”

पीठ ने कहा कि सोमवार को हुई सुनवाई अधूरी रही और मंगलवार को आगे बहस होगी। यह मामला केवल वांगचुक की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में असहमति, क्षेत्रीय स्वायत्तता की मांग और एनएसए जैसे कानूनों के इस्तेमाल की संवैधानिक सीमाओं को भी चुनौती देता दिख रहा है।

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