‘बड़े खिलाड़ियों को पर्यावरण के नियमों का अधिक सख्ती से पालन करना होगा’: सुप्रीम कोर्ट ने NGT द्वारा प्रोजेक्ट कॉस्ट पर आधारित हर्जाने को सही ठहराया

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने के मामले में हर्जाना तय करते समय नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) प्रोजेक्ट की कुल लागत या टर्नओवर को आधार बना सकता है। कोर्ट ने कहा कि किसी विशिष्ट वैधानिक फार्मूले की अनुपस्थिति में, ‘प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे’ (Polluter Pays Principle) के सिद्धांत के तहत हर्जाना तय करने का अधिकार NGT के पास सुरक्षित है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने पुणे के दो रियल एस्टेट डेवलपर्स — मैसर्स रिदम काउंटी (RHYTHM) और मैसर्स की स्टोन प्रॉपर्टीज (KEYSTONE) — की अपीलों को खारिज कर दिया। इन डेवलपर्स ने NGT के उन आदेशों को चुनौती दी थी जिनमें उन्हें क्रमशः ₹5 करोड़ और ₹4.47 करोड़ का पर्यावरणीय मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद पुणे में चल रहे दो अलग-अलग हाउसिंग प्रोजेक्ट्स से जुड़ा है। रिदम काउंटी के मामले में NGT ने पाया कि बिल्डर ने स्वीकृत सीमा से अधिक निर्माण किया और आवश्यक वैधानिक अनुमतियां (Consent-to-Establish) नहीं लीं। यहाँ तक कि महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) द्वारा जारी ‘काम रोको’ (Stop-work) आदेश के बावजूद निर्माण कार्य जारी रहा।

वहीं, की स्टोन प्रॉपर्टीज के मामले में, हालांकि बिल्डर ने उल्लंघन नियमितीकरण विंडो के तहत बाद में पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त कर ली थी, लेकिन NGT ने पाया कि बिल्डर ने 2013 से 2020 तक बिना अनुमति के निर्माण कार्य जारी रखा और बिना ‘कन्सेंट-टू-ऑपरेट’ के ही फ्लैटों का कब्जा देना शुरू कर दिया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं का तर्क: डेवलपर्स की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि NGT ने CPCB (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) के उस फार्मूले का उपयोग किया जो औद्योगिक इकाइयों के लिए बनाया गया है, न कि रिहायशी प्रोजेक्ट्स के लिए। उनकी मुख्य दलीलें थीं:

  • पर्यावरणीय हर्जाना तय करने के लिए प्रोजेक्ट की लागत या टर्नओवर का कोई तर्कसंगत संबंध (Rational Nexus) नहीं है।
  • NGT ने स्वतंत्र रूप से विचार करने के बजाय केवल संयुक्त समिति की रिपोर्ट पर भरोसा करके अपने न्यायिक कार्य का ‘आउटसोर्सिंग’ कर दिया।
  • उन्होंने DPCC बनाम लोधी प्रॉपर्टी कंपनी लिमिटेड (2025) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब तक नियमों में स्पष्ट फार्मूला न हो, तब तक भारी जुर्माना नहीं लगाया जा सकता।
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केंद्र सरकार का रुख: यूनियन ऑफ इंडिया की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि ये उल्लंघन तकनीकी नहीं बल्कि गंभीर थे। उन्होंने कहा कि NGT का फैसला ‘प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे’ के सिद्धांत पर आधारित है और यह उल्लंघन के पैमाने के अनुरूप है।

कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या कानून में कोई निर्धारित फार्मूला न होने पर भी NGT प्रोजेक्ट की लागत के आधार पर मुआवजा बढ़ा सकता है?

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1. NGT की विवेकाधीन शक्तियां कोर्ट ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक्ट, 2010 की धारा 15 और 20 का हवाला देते हुए कहा कि ये धाराएं ट्रिब्यूनल को व्यापक शक्तियां देती हैं। बेंच ने टिप्पणी की:

“धारा 15 में ‘जैसा ट्रिब्यूनल उचित समझे’ शब्दावली का प्रयोग यह दर्शाता है कि विधायिका ने जानबूझकर NGT को यह विवेक दिया है कि वह पर्यावरणीय क्षति की गंभीरता के अनुसार राहत और हर्जाना तय कर सके।”

2. टर्नओवर और प्रोजेक्ट कॉस्ट की प्रासंगिकता टर्नओवर के आधार पर हर्जाने का विरोध करने वाली दलीलों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि बड़े प्रोजेक्ट्स का पर्यावरणीय प्रभाव भी बड़ा होता है:

“प्रोजेक्ट के पैमाने को प्रभाव से जोड़ना यह संदेश देता है कि बड़े खिलाड़ियों को पर्यावरण के अधिक हरित नियमों का पालन करने की आवश्यकता है… यह कहना गलत होगा कि हर्जाने की गणना में टर्नओवर कभी भी एक प्रासंगिक कारक नहीं हो सकता।”

3. न्यायिक मिसालें कोर्ट ने अपने पिछले फैसले मैसर्स गोयल गंगा डेवलपर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) का सहारा लिया, जिसमें कहा गया था कि गंभीर मामलों में प्रोजेक्ट लागत का 5% तक हर्जाना लगाया जा सकता है। वर्तमान मामले में रिदम काउंटी पर लगा ₹5 करोड़ का जुर्माना प्रोजेक्ट लागत का केवल 1.49% था, जिसे कोर्ट ने मनमाना नहीं माना।

4. CPCB फार्मूला एक मार्गदर्शक उपकरण CPCB फार्मूले पर उठ रहे सवालों पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि यह फार्मूला कोई “कठोर संहिता” नहीं है, लेकिन यह एक “सुविधाजनक और सांकेतिक उपकरण” के रूप में कार्य करता है।

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि NGT ने संयुक्त समितियों की रिपोर्ट का केवल यंत्रवत् पालन नहीं किया, बल्कि अपना स्वतंत्र विवेक लगाया है।

कोर्ट ने अपने निष्कर्ष में कहा:

  • NGT को पर्यावरणीय मुआवजा तय करने के लिए प्रोजेक्ट टर्नओवर को आधार बनाने से रोका नहीं जा सकता।
  • पर्यावरणीय हर्जाना “तर्कसंगत, आनुपातिक और कारण सहित” होना चाहिए।
  • CPCB ढांचा विशेषज्ञों द्वारा किए जाने वाले मूल्यांकन के लिए एक स्वीकार्य प्रारंभिक बिंदु है।

इन टिप्पणियों के साथ कोर्ट ने दोनों अपीलों को खारिज कर दिया, हालांकि बिल्डरों को हर्जाना राशि जमा करने के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया गया है।

केस विवरण (Case Details):

  • केस का नाम: मैसर्स रिदम काउंटी बनाम सतीश संजय हेगड़े और अन्य (संबद्ध अपील के साथ)
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 7187/2022
  • बेंच: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस विजय बिश्नोई

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