उत्तराधिकार प्रमाण पत्र केवल देनदार को सुरक्षित करता है, संपत्ति के मालिकाना हक को समाप्त नहीं करता: गुजरात हाईकोर्ट

उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) को लेकर अक्सर यह भ्रांति रहती है कि जिसे यह मिल गया, वही संपत्ति का अंतिम मालिक है। इस भ्रांति को दूर करते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उत्तराधिकार प्रमाण पत्र केवल एक सरसरी (summary) कार्यवाही है जिसका उद्देश्य देनदार (debtor) को भुगतान के लिए सुरक्षित (indemnify) करना है। यह प्रमाण पत्र अंतिम रूप से यह निर्धारित नहीं करता कि संपत्ति का असली वारिस कौन है।

गुजरात हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जे.सी. दोशी की पीठ ने मृतक सरकारी कर्मचारी की पत्नी और नॉमिनी को उत्तराधिकार प्रमाण पत्र दिए जाने के खिलाफ दायर एक याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि प्रमाण पत्र जारी होने से “याचिकाकर्ता (revisionist) के संपत्ति के अधिकार (proprietary rights) खत्म नहीं होते” और प्रमाण पत्र धारक असल वारिसों के लिए एक ‘ट्रस्टी’ की तरह कार्य करता है।

क्या था पूरा मामला?

यह कानूनी विवाद डॉ. प्रतापसिंह हरवारीलाल दलाल की दुखद मृत्यु के बाद शुरू हुआ। डॉ. दलाल जूनागढ़ स्थित वेटरनरी और एनिमल हसबेंडरी एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर और वेटरनरी डॉक्टर थे। 3 मई, 2016 को एक सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई।

उनकी मृत्यु के बाद, उनके सेवा लाभों (Service Benefits) पर दावे को लेकर विवाद खड़ा हो गया। रंजनबेन प्रतापसिंह दलाल (प्रतिवादी संख्या 1) ने दावा किया कि वह मृतक की कानूनी रूप से ब्याहता पत्नी हैं, जिनसे 1993 में विवाह हुआ था। रंजनबेन का नाम मृतक की सर्विस बुक में नॉमिनी के तौर पर भी दर्ज था। उन्होंने अपने दो बच्चों के साथ भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 372 के तहत उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया।

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दूसरी ओर, सतवंतीबेन (याचिकाकर्ता) सामने आईं और दावा किया कि वह मृतक की पहली पत्नी हैं और उनका विवाह 1977 में हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया कि रंजनबेन ने परिवार के अन्य सदस्यों की जानकारी छिपाकर और धोखाधड़ी से प्रमाण पत्र प्राप्त करने की कोशिश की है।

निचली अदालत (प्रिंसिपल सीनियर सिविल जज, जूनागढ़) ने 21 अक्टूबर, 2016 को रंजनबेन और उनके बच्चों के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके बाद सतवंतीबेन ने जिला अदालत में अपील की, लेकिन 31 अगस्त, 2020 को वहां से भी उनकी अपील खारिज कर दी गई। अंत में, उन्होंने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

दलीलों का दौर

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान, सतवंतीबेन के वकील श्री के.वी. शेलात ने तर्क दिया कि रंजनबेन ने जानबूझकर अधिनियम की धारा 372(1)(c) का उल्लंघन करते हुए अन्य करीबी रिश्तेदारों की जानकारी छिपाई। उन्होंने शक्ति येजदानी बनाम जयानंद जयंत सालगांवकर (2024) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि “उत्तराधिकार का सामान्य सिद्धांत नॉमिनेशन पर भारी पड़ना चाहिए” और नॉमिनी केवल एक ट्रस्टी होता है।

इसके जवाब में, रंजनबेन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शालिन मेहता ने दलील दी कि सतवंतीबेन यह साबित करने में पूरी तरह विफल रही हैं कि वह मृतक की कानूनी रूप से ब्याहता पत्नी थीं। उन्होंने मृतक के सर्विस रिकॉर्ड का हवाला दिया, जिसमें डॉ. दलाल ने स्वयं अपने सहयोगियों की उपस्थिति में रंजनबेन को अपनी पत्नी और नॉमिनी घोषित किया था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और फैसला

मामले की गहराई से जांच करने के बाद, न्यायमूर्ति जे.सी. दोशी ने निचली अदालतों के निष्कर्षों को बरकरार रखा।

सबूतों का अभाव: कोर्ट ने पाया कि सतवंतीबेन अपनी शादी के दावे को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सकीं। कोर्ट ने भारत संघ बनाम इब्राहिम उद्दीन (2012) के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि अपीलीय अदालत का काम यह नहीं है कि वह किसी पक्ष द्वारा पेश न किए गए सबूतों की कमी को पूरा करे। केवल फोटोकॉपी पेश करना पर्याप्त नहीं था।

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सर्विस रिकॉर्ड का महत्व: कोर्ट ने मृतक के सर्विस रिकॉर्ड को महत्वपूर्ण माना, जहां डॉ. दलाल ने अपनी मां के नाम का नॉमिनेशन रद्द करके 1995 में रंजनबेन और उनके बच्चों को नॉमिनी बनाया था। कोर्ट ने गुजरात सिविल सेवा पेंशन नियम, 2002 के नियम 85 का हवाला दिया, जो परिवार के सदस्यों के पक्ष में नॉमिनेशन को मान्यता देता है।

उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की प्रकृति: कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए, कोर्ट ने बनारसी दास बनाम टीकू दत्ता (2005) और संध्या बनर्जी बनाम श्यामा बनर्जी (2010) के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा जताया। न्यायमूर्ति दोशी ने कहा:

“उत्तराधिकार प्रमाण पत्र किसी व्यक्ति (वारिस या नॉमिनी) के पक्ष में जारी किया जा सकता है… लेकिन यह प्रमाण पत्र मृतक की संपत्ति पर प्रशासन का कोई सामान्य अधिकार नहीं देता और न ही यह धारक को अंतिम वारिस (Heir) के रूप में स्थापित करता है। यह केवल उसे मृतक का बकाया वसूलने का अधिकार देता है और भुगतान करने वाले (जैसे बैंक या नियोक्ता) को सुरक्षा प्रदान करता है।”

कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि चूंकि रंजनबेन नॉमिनी थीं और प्रथम दृष्टया (prima facie) उनका दावा मजबूत था, इसलिए उन्हें प्रमाण पत्र देना सही था। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रमाण पत्र के जारी होने से सतवंतीबेन के मालिकाना हक (यदि कोई हों) समाप्त नहीं होते हैं, और प्रमाण पत्र धारक केवल कानूनन वारिसों के लिए एक ट्रस्टी के रूप में कार्य करता है।

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अंततः, हाईकोर्ट ने सतवंतीबेन की याचिका को खारिज कर दिया और फैसले पर रोक लगाने के उनके अनुरोध को भी अस्वीकार कर दिया।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: मृतक प्रतापसिंह हरवारीलाल दलाल के वारिस – सतवंतीबेन प्रतापसिंह दलाल बनाम रंजनबेन प्रतापसिंह दलाल और अन्य
  • केस नंबर: आर/सिविल रिविजन एप्लीकेशन संख्या 146/2020
  • कोरम: न्यायमूर्ति जे.सी. दोशी
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री के.वी. शेलात
  • प्रतिवादी संख्या 1 के वकील: श्री शालिन मेहता, वरिष्ठ अधिवक्ता (साथ में श्री निनाद पी. शाह)
  • प्रतिवादी यूनिवर्सिटी के वकील: श्री अमर डी. मिथानी

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