बार एसोसिएशन संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ नहीं; निजी विवादों के लिए इसके खिलाफ रिट याचिका विचारणीय नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने नई दिल्ली बार एसोसिएशन के खिलाफ निर्देश मांगने वाली एक वकील की अपील को खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि बार एसोसिएशन एक निजी निकाय (Private Body) है जो अपने सदस्यों के कल्याण के लिए कार्य करता है और यह कोई सार्वजनिक कार्य (Public Function) नहीं करता। कोर्ट ने माना कि बार एसोसिएशन संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ (State) या राज्य का उपकरण नहीं है, इसलिए इसके खिलाफ रिट याचिका विचारणीय (Maintainable) नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील संगीता राय बनाम नई दिल्ली बार एसोसिएशन व अन्य के मामले में दायर की गई थी, जिसमें एकल न्यायाधीश (Single Judge) द्वारा 30 अक्टूबर, 2023 को पारित आदेश को चुनौती दी गई थी। एकल न्यायाधीश ने अपीलकर्ता की रिट याचिका को खारिज कर दिया था।

अपीलकर्ता, जो वर्ष 2000 से बार काउंसिल में नामांकित एक वकील हैं, ने दावा किया कि 2013 में पटियाला हाउस कोर्ट परिसर में चैंबर नंबर 279A के आवंटी (Allottee) श्री असगर अली ने उन्हें मासिक किराए पर चैंबर का उपयोग करने का अनुरोध किया था। उन्होंने कहा कि वह तब से उस चैंबर से अपना काम कर रही थीं।

विवाद तब उत्पन्न हुआ जब अपीलकर्ता ने आरोप लगाया कि श्री असगर अली ने दस अन्य लोगों के साथ मिलकर ताला तोड़ा और चैंबर पर कब्जा कर लिया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 4 फरवरी, 2023 को नई दिल्ली बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने उन्हें परिसर खाली करने की धमकी दी और चैंबर पर अपना ताला लगा दिया। उनका कहना था कि 6 मार्च, 2023 को उनकी केस फाइलें और सामान सड़क पर फेंक दिया गया।

अपनी रिट याचिका में, अपीलकर्ता ने मांग की थी:

  1. प्रतिवादी (Respondents) अपना ताला हटाएं और चैंबर का कब्जा उन्हें सौंपें।
  2. बार एसोसिएशन और बार काउंसिल ऑफ दिल्ली को निर्देश दिया जाए कि वे उन वकीलों के खिलाफ उचित कार्रवाई करें जिन्होंने अवैध गतिविधियों और चैंबर में आपराधिक अतिचार (Criminal Trespass) किया है।
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एकल न्यायाधीश ने याचिका खारिज करते हुए कहा था कि अपीलकर्ता आवंटी नहीं थीं, बल्कि एक अनुमति व्यवस्था (Permissive Arrangement) के आधार पर कब्जे का दावा कर रही थीं। कथित आपराधिक कृत्यों के संबंध में, एकल न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (साकिरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और प्रियंका श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) का हवाला देते हुए कहा था कि अपीलकर्ता के पास दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत उपचार उपलब्ध हैं।

पक्षों की दलीलें

अपील में, अपीलकर्ता के वकील ने कहा कि वे केवल रिट याचिका की प्रार्थना ‘बी’ (Prayer B) पर जोर दे रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि एकल न्यायाधीश ने बार एसोसिएशन और/या बार काउंसिल ऑफ दिल्ली को उन वकीलों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश न देकर गलती की है, जिन्होंने कथित रूप से आपराधिक अतिचार किया था।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने रिट याचिका की स्वीकार्यता पर प्रारंभिक आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि बार एसोसिएशन संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत न तो ‘राज्य’ है और न ही इसका कोई उपकरण, इसलिए इसके खिलाफ रिट जारी नहीं की जा सकती।

कोर्ट का विश्लेषण

खंडपीठ ने बार एसोसिएशन की स्थिति और मांगी गई राहत की प्रकृति की विस्तार से जांच की।

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1. बार एसोसिएशन ‘राज्य’ नहीं है कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि बार एसोसिएशन वकीलों का एक संघ है जो सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत है। इसका प्राथमिक उद्देश्य अपने सदस्यों का कल्याण सुनिश्चित करना है।

पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:

“बार एसोसिएशन निजी व्यक्तिगत वकीलों का एक निकाय है और अपने कार्यों के सामान्य निर्वहन में, यह कोई ऐसा कार्य नहीं करता जिसे सार्वजनिक कार्य (Public Function) कहा जा सके… यह वास्तव में, पूरी तरह से एक निजी इकाई है और इसे किसी भी तरीके से या किसी भी कारण से ‘राज्य’ या इसका उपकरण या एजेंसी नहीं कहा जा सकता है।”

परिणामस्वरूप, कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए बार एसोसिएशन को कोई परमादेश (Mandamus) जारी नहीं किया जा सकता है।

2. आपराधिक कृत्यों के लिए वैकल्पिक उपाय कुछ वकीलों द्वारा आपराधिक अतिचार के आरोपों के संबंध में, खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के विचार से सहमति व्यक्त की। कोर्ट ने कहा:

“वकीलों के ऐसे कृत्य, जिनकी शिकायत अपीलकर्ता ने की है, आपराधिक कार्रवाई के वारंट हो सकते हैं, हालांकि, उक्त उद्देश्य के लिए; एकल न्यायाधीश ने सही ही कहा है कि अपीलकर्ता आपराधिक कानून के तहत कार्यवाही शुरू करके उचित कदम उठा सकती हैं।”

3. बार काउंसिल के खिलाफ रिट कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ दिल्ली को निर्देश देने की प्रार्थना पर भी विचार किया। पीठ ने सिद्धांत स्थापित किया कि परमादेश रिट (Writ of Mandamus) मांगने के लिए, याचिकाकर्ता को पहले संबंधित अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए।

“यह स्थापित कानून है कि परमादेश रिट मांगने के लिए, कोर्ट जाने वाले व्यक्ति को पहले संबंधित अधिकारियों से संपर्क करना होगा… और केवल संबंधित सार्वजनिक अधिकारियों की ओर से विफलता के मामले में ही परमादेश रिट मांगी जा सकती है…”

कोर्ट ने noted किया कि अपीलकर्ता ने न तो बार काउंसिल ऑफ दिल्ली के समक्ष अपना पक्ष रखा था और न ही उन्हें एकल न्यायाधीश के समक्ष प्रतिवादी बनाया था। इसलिए, कोई परमादेश जारी नहीं किया जा सकता।

निर्णय

हाईकोर्ट ने अपील में कोई दम नहीं पाया और इसे खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस खारिज आदेश से अपीलकर्ता के अन्य कानूनी रास्ते बंद नहीं होंगे।

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“इस अपील के खारिज होने के बावजूद, यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि अपीलकर्ता के लिए कानून के तहत अनुमति के अनुसार उपयुक्त नागरिक या आपराधिक कार्रवाई (Civil or Criminal Action) का सहारा लेने… या बार काउंसिल ऑफ दिल्ली सहित संबंधित प्राधिकरण से संपर्क करने का विकल्प हमेशा खुला रहेगा।”

केस विवरण

  • केस टाइटल: संगीता राय बनाम नई दिल्ली बार एसोसिएशन व अन्य
  • अपील संख्या: एलपीए (LPA) 368/2024
  • कोरम: मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया

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