अवैध बांग्लादेशी व रोहिंग्या लोगों को बसाने के आरोप में अग्रिम ज़मानत याचिका ख़ारिज; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी की लापरवाही पर जताई नाराज़गी

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक ऐसे व्यक्ति की अग्रिम ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी है, जिस पर देश के विभिन्न हिस्सों में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या लोगों को बसाने में मदद करने का गंभीर आरोप है। अदालत ने कहा कि ऐसे कृत्य देश की “सुरक्षा, शांति और सामाजिक सौहार्द्र” के लिए खतरा हैं।

न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति पी.के. श्रीवास्तव की खंडपीठ ने अब्दुल ग़फ्फार की याचिका को खारिज करते हुए विशेष एनआईए अदालत के नवंबर 2025 के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया, जिसमें उनकी अग्रिम ज़मानत याचिका पहले ही ठुकरा दी गई थी।

पीठ ने आदेश में कहा कि मामले की FIR 11 अक्टूबर 2023 को लखनऊ के गोमती नगर स्थित एंटी टेररिस्ट स्क्वाड (ATS) थाना में दर्ज हुई थी, लेकिन अभी तक जांच एजेंसी ने याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी नहीं की है। इसपर अदालत ने गहरी नाराज़गी और असंतोष जताते हुए जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली को “लापरवाह और उदासीन” बताया।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि आदेश की प्रति मुख्य सचिव, अपर मुख्य सचिव (गृह), प्रमुख सचिव, मुख्यमंत्री के सचिव, और पुलिस महानिदेशक को भेजी जाए ताकि वे स्थिति की गंभीरता को समझें और उचित कार्रवाई करें।

कोर्ट ने एनआईए को अब्दुल ग़फ्फार की आवश्यक होने पर गिरफ्तारी की अनुमति दी और कहा कि याचिकाकर्ता को एक सप्ताह के भीतर सभी दस्तावेज और साक्ष्य जांच अधिकारियों को सौंपने होंगे।

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सरकारी वकील एसएन तिलहरी ने अदालत को बताया कि अब्दुल ग़फ्फार और अन्य आरोपियों ने विदेशों से अवैध तरीक़े से पैसा लेकर उसे बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की मदद के लिए प्रयोग किया।

उनके अनुसार, यह पैसा हवाला लेन-देन और फर्जी बैंक खातों के माध्यम से प्राप्त किया गया और फिर इसका उपयोग इन लोगों के लिए झुग्गी-झोपड़ी और घर बनवाने में किया गया।

तिलहरी ने अदालत को बताया कि जांच एजेंसी ने सर्विलांस और अन्य माध्यमों से याचिकाकर्ता के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य एकत्र किए हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि आरोपी एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा है, जो देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त अवैध घुसपैठियों को सहायता पहुंचा रहा है।

अब्दुल ग़फ्फार की ओर से कहा गया कि FIR दर्ज हुए काफ़ी समय हो गया, लेकिन अब तक गिरफ्तारी नहीं हुई, जिससे यह साबित होता है कि उनके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं है।

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हालाँकि, कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि प्रस्तावित अपराधों की गंभीरता को देखते हुए हिरासत में पूछताछ आवश्यक है

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