“घिनौना आचरण…” – सुप्रीम कोर्ट ने ट्रेन में महिला की सीट पर पेशाब करने के आरोपी जज की बहाली पर उठाया सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मध्य प्रदेश के एक सिविल जज के कथित आचरण पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की, जिन पर 2018 में एक ट्रेन यात्रा के दौरान शराब के नशे में हंगामा करने और एक महिला सह-यात्री की सीट पर पेशाब करने का आरोप है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने आरोपी जज, नवनीत सिंह यादव, की सेवा में बहाली के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए हैं। पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए इस घटना को “चौकाने वाला” और न्यायिक अधिकारी के आचरण को “घिनौना” करार दिया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (प्रशासनिक पक्ष) द्वारा दायर एक अपील से संबंधित है। हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति ने अपनी ही डिविजन बेंच (युगल पीठ) के मई 2025 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें बर्खास्त सिविल जज को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया गया था।

डिविजन बेंच ने जज की बर्खास्तगी को इसलिए रद्द कर दिया था क्योंकि उन्हें एक आपराधिक अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस बरी किए जाने के आधार पर कड़ी आपत्ति जताई।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, “हमें समझ नहीं आ रहा कि हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला कैसे दिया… एक न्यायिक अधिकारी का ऐसा घिनौना आचरण। आपने सभी गवाहों को अपने पक्ष में कर लिया (गवाह मुकर गए)। यह एक चौंकाने वाला मामला है। आपने कंपार्टमेंट में पेशाब किया। वहां एक महिला भी थी।”

2018 की ट्रेन घटना और आरोप

विवाद की जड़ 2018 की एक घटना है जब सिविल जज इंदौर से जबलपुर की यात्रा कर रहे थे। याचिका के अनुसार, वह बिना पूर्व अनुमति या अपने वरिष्ठों को सूचित किए यात्रा कर रहे थे। उन पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं:

  • आरोप है कि जज ने शराब का सेवन किया और सह-यात्रियों व रेलवे स्टाफ के साथ गाली-गलौज की।
  • टीटीई (TTE) को उनकी ड्यूटी करने से रोका और अपने न्यायिक पहचान पत्र का दुरुपयोग कर अन्य यात्रियों को धमकाया।
  • सबसे गंभीर आरोप यह है कि उन्होंने खुद को उजागर किया और एक महिला यात्री की सीट पर पेशाब कर दी।
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इस घटना के बाद टीटीई की शिकायत पर रेलवे अधिनियम के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। हालांकि, ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता और पीड़ित महिला सहित प्रमुख अभियोजन गवाह अपने बयानों से मुकर गए (hostile हो गए), जिसके परिणामस्वरूप जज को बरी कर दिया गया।

विभागीय जांच बनाम आपराधिक बरी

भले ही आपराधिक अदालत ने उन्हें बरी कर दिया हो, लेकिन हाईकोर्ट के प्रशासनिक पक्ष द्वारा की गई समानांतर ‘विभागीय जांच’ (Departmental Inquiry) में कहानी कुछ और ही थी। जांच अधिकारी ने सभी आरोपों को सही पाया। इसके बाद प्रशासनिक समिति और फुल कोर्ट (Full Court) ने उन्हें सेवा से हटाने की सिफारिश की। सितंबर 2019 में राज्यपाल के आदेश से उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।

मई 2025 में, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एक डिविजन बेंच ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली और आपराधिक मामले में बरी होने के आधार पर उनकी बर्खास्तगी को रद्द कर दिया। बेंच ने केवल छोटी-मोटी प्रशासनिक खामियों के लिए मामूली दंड की सिफारिश की।

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हाईकोर्ट प्रशासन ने दी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

हाईकोर्ट के प्रशासन ने अधिवक्ता दिव्यकांत लाहोटी के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि आपराधिक मुकदमे और अनुशासनात्मक कार्यवाही में सबूतों का मानक (Standard of Proof) अलग-अलग होता है।

याचिका में कहा गया है कि डिविजन बेंच ने अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि निचली अदालत से बरी होना “निर्दोषता का प्रमाण” नहीं था, बल्कि यह इसलिए हुआ क्योंकि गवाह मुकर गए थे।

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याचिका में सख्त टिप्पणी की गई है: “प्रतिवादी नंबर 1 (सिविल जज) ने महिला सह-यात्री की सीट पर पेशाब करके और घोर अश्लीलता का प्रदर्शन करके अत्यंत अभद्र आचरण किया है, जो एक न्यायाधीश के लिए अशोभनीय है।”

प्रशासनिक पक्ष ने तर्क दिया कि न्यायिक पद पर बैठे व्यक्ति से आत्म-अनुशासन के उच्च मानकों की अपेक्षा की जाती है। ऐसे “घोर कदाचार” वाले अधिकारी को सेवा में बनाए रखने से न्यायपालिका की संस्थागत अनुशासन और सार्वजनिक विश्वास को ठेस पहुंचेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और प्रतिवादी जज को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

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