बिना स्पष्ट नियम या सरकारी मंजूरी के सेवानिवृत्त कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट 

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि सेवा नियमों में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो किसी कर्मचारी के रिटायर होने के बाद उसके खिलाफ विभागीय जांच (Departmental Enquiry) शुरू नहीं की जा सकती।

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने महाराष्ट्र स्टेट वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन (MSWC) बनाम कादिरखान अहमदखान पठान मामले में यह निर्णय सुनाया। कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए सेवानिवृत्त कर्मचारी के पक्ष में फैसला दिया और उनके खिलाफ चल रही अनुशासनात्मक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

मामला क्या था?

यह मामला कादिरखान अहमदखान पठान से जुड़ा है, जो महाराष्ट्र स्टेट वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन में ‘स्टोरेज सुपरिंटेंडेंट’ के पद पर कार्यरत थे। वे 31 अगस्त 2008 को सेवानिवृत्त (Retire) हो गए थे।

रिटायरमेंट के लगभग 11 महीने बाद, अगस्त 2009 में कॉरपोरेशन ने उन्हें एक कारण बताओ नोटिस जारी किया। उन पर आरोप लगाया गया कि 2006 से 2008 के बीच ‘सेंटर हेड’ के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान कॉरपोरेशन को लगभग 37 लाख रुपये (बाद में संशोधित) का वित्तीय नुकसान हुआ था।

लंबी जांच प्रक्रिया के बाद, 4 मार्च 2017 को कॉरपोरेशन ने उन्हें दोषी ठहराते हुए 18,09,809 रुपये के नुकसान के लिए जिम्मेदार माना। इस वसूली के लिए कॉरपोरेशन ने उनके ग्रेच्युटी और लीव इनकैशमेंट सहित 4,43,013 रुपये के रिटायरमेंट बेनिफिट्स (Retiral Benefits) को रोक लिया और शेष राशि की वसूली का आदेश दिया।

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कानूनी विवाद

मुख्य सवाल यह था कि क्या कॉरपोरेशन अपने 1992 के सेवा विनियमों (Regulations) में स्पष्ट प्रावधान न होने के बावजूद, महाराष्ट्र सिविल सर्विसेज (पेंशन) नियम, 1982 के नियम 27 का सहारा लेकर रिटायरमेंट के बाद जांच शुरू कर सकता है?

कॉरपोरेशन का तर्क था कि उनके विनियमों का नियम 110 उन्हें उन मामलों में सरकारी नियमों (पेंशन रूल्स) को अपनाने की अनुमति देता है जहां उनके खुद के नियम मौन हैं।

कोर्ट की टिप्पणी और विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने कॉरपोरेशन की दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु रखे:

  1. स्पष्ट प्रावधान का अभाव: कोर्ट ने पाया कि कॉरपोरेशन के पास रिटायरमेंट के बाद जांच शुरू करने के लिए कोई वैधानिक अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) नहीं था। नियम 110 केवल एक संदर्भ नियम है और यह अपने आप पेंशन नियमों को लागू नहीं कर देता जब तक कि बोर्ड द्वारा इसे स्पष्ट रूप से अपनाया न गया हो।
  2. सरकारी मंजूरी (Sanction) अनिवार्य है: कोर्ट ने कहा कि अगर पेंशन नियमों का नियम 27 लागू भी होता, तो भी रिटायरमेंट के बाद कार्यवाही शुरू करने के लिए नियम 27(2)(b) के तहत राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य है।
  3. ‘सामान्य मंजूरी’ का तर्क खारिज: कॉरपोरेशन ने तर्क दिया था कि 1992 के नियमों को सरकार से मंजूरी मिली थी, जिसे ‘सामान्य मंजूरी’ (General Sanction) माना जाना चाहिए। कोर्ट ने इसे तर्कहीन बताते हुए कहा कि नियम में “Shall” शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है कि प्रत्येक मामले में अलग से मंजूरी लेना अनिवार्य है। यह एक सुरक्षा उपाय है ताकि रिटायर कर्मचारियों को अनावश्यक परेशान न किया जाए।
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फैसला और निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें याचिकाकर्ता को विभागीय अपील करने के लिए कहा गया था।

कोर्ट का अंतिम आदेश:

  • सेवानिवृत्त कर्मचारी के खिलाफ शुरू की गई सभी विभागीय कार्यवाही को रद्द (Quash) कर दिया गया।
  • कॉरपोरेशन को निर्देश दिया गया कि वह रोके गए सभी सेवानिवृत्ति लाभ (Retiral Benefits) को 8 सप्ताह के भीतर जारी करे।
  • यदि इस दौरान कर्मचारी से कोई राशि वसूल की गई है, तो उसे भी निर्धारित समय सीमा के भीतर वापस किया जाए।
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यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत है जिनके खिलाफ बिना किसी ठोस कानूनी आधार के रिटायरमेंट के बाद पुराने मामलों को लेकर जांच शुरू कर दी जाती है।

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