तमिलनाडु में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण पर सीपीआई(एम) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, कहा—‘मनमाना, अवैध और असंवैधानिक कदम’

 कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) [CPI(M)] ने तमिलनाडु में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर निर्वाचन आयोग के निर्देशों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। पार्टी ने इस पूरी प्रक्रिया को “मनमाना, अवैध और असंवैधानिक” बताया है।

यह याचिका पी. शन्मुगम, सीपीआई(एम) तमिलनाडु राज्य सचिव द्वारा दायर की गई है, जिसमें आयोग के 27 अक्टूबर 2025 के आदेश को रद्द करने की मांग की गई है। इस आदेश में आयोग ने एक महीने के भीतर विशेष पुनरीक्षण पूरा करने का निर्देश दिया था

मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ के समक्ष सोमवार को यह मामला आया। पार्टी की ओर से अधिवक्ता ने अनुरोध किया कि इस याचिका को डीएमके की याचिका के साथ ही मंगलवार को सुना जाए, जो इसी आदेश को चुनौती देती है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “देखते हैं।” सुप्रीम कोर्ट डीएमके की याचिका पर 11 नवम्बर को सुनवाई करेगा।

पार्टी ने कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता और समावेशन सुनिश्चित करने का उद्देश्य विवादित नहीं है, लेकिन निर्वाचन आयोग द्वारा तय की गई समयसीमा और पद्धति “व्यावहारिक रूप से असंभव, अव्यावहारिक और कानून के विपरीत” है, जो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के प्रावधानों का उल्लंघन करती है।

याचिका के अनुसार, आयोग ने 4 नवम्बर से 4 दिसम्बर 2025 तक की अवधि में 6.18 करोड़ मतदाताओं के नामांकन की प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया है। प्रत्येक बूथ लेवल अधिकारी (BLO) को प्रतिदिन लगभग 500 घरों का दौरा करने का लक्ष्य दिया गया है, जिसे याचिकाकर्ता ने “मानवतः असंभव” बताया है। याचिका में कहा गया है कि एक बीएलओ प्रतिदिन अधिकतम 40 से 50 घरों का ही प्रभावी रूप से सत्यापन कर सकता है।

READ ALSO  दिल्ली हाई कोर्ट ने गुटखा, पान मसाला के निर्माण, बिक्री पर प्रतिबंध बरकरार रखा

सीपीआई(एम) ने कहा कि पूरी पुनरीक्षण प्रक्रिया के लिए केवल 102 दिन का समय रखा गया है, जिसमें प्रशिक्षण, सत्यापन, प्रारूप सूची प्रकाशन, आपत्तियों का निपटान और अंतिम प्रकाशन जैसी कई प्रक्रियाएं शामिल हैं। इतनी कम समयसीमा में मतदाताओं और राजनीतिक दलों की सार्थक भागीदारी असंभव हो जाएगी, जिससे ‘गहन पुनरीक्षण’ का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।

पार्टी ने आयोग के इस कदम को “रंगदारीपूर्ण शक्तियों का प्रयोग” करार दिया और कहा कि तमिलनाडु में मतदाता सूची में किसी बड़े पैमाने पर गड़बड़ी या अनियमितता का कोई सबूत पेश नहीं किया गया है। इस कारण यह निर्णय अनुचित, अनुपातहीन और प्रक्रियात्मक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट: राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने वाली जमानत की शर्तें मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं

याचिका में यह भी चेतावनी दी गई है कि यह अभियान हाशिए पर मौजूद समुदायों और प्रवासी मतदाताओं के “बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित होने” का कारण बन सकता है।

सीपीआई(एम) ने निर्वाचन आयोग पर अपने संवैधानिक अधिकारों से आगे जाकर नागरिकता सत्यापन और “संदिग्ध विदेशी नागरिकों” को चिन्हित करने की अनुमति देने का आरोप लगाया है, जिसे उसने “डी फैक्टो एनआरसी प्रक्रिया” करार दिया।

याचिका में कहा गया है कि इस प्रक्रिया को बिना राज्य सरकार की सहमति के थोपना संघीय सहयोग (Cooperative Federalism) के सिद्धांत का उल्लंघन है, और इससे तमिलनाडु सरकार को “केंद्र द्वारा तय की गई एकतरफा कवायद की मात्र कार्यान्वयन एजेंसी” बना दिया गया है।

याचिका में अनुरोध किया गया है कि 24 जून और 27 अक्टूबर 2025 के निर्वाचन आयोग के आदेशों को संविधान और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के विपरीत (Ultra Vires) घोषित कर निरस्त किया जाए।

READ ALSO  सोशल मीडिया प्रोफाइल पर औरंगजेब की तस्वीर का इस्तेमाल करने के आरोप में नवी मुंबई के एक शख्स पर FIR दर्ज
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles