सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को 2016 के सुरजगढ़ आगजनी मामले में दस्तावेज दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को महाराष्ट्र सरकार को 2016 के सुरजगढ़ लौह अयस्क खान आगजनी मामले में दस्तावेज दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है। यह वही मामला है जिसमें अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग आरोपी हैं और जिसके ट्रायल में देरी को लेकर शीर्ष अदालत ने पहले नाराजगी जताई थी।

न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति विजय विष्णोई की पीठ इस मामले में गाडलिंग की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के जनवरी 2023 के आदेश को चुनौती दी है। उस आदेश में हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत देने से इंकार कर दिया था।

सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने दस्तावेज दाखिल करने के लिए कुछ और समय की मांग की। वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर, जो गाडलिंग की ओर से पेश हुए, ने इसका विरोध करते हुए कहा कि राज्य को पहले ही चार सप्ताह से अधिक का समय मिल चुका है।

राजू ने अदालत से आग्रह किया कि दस्तावेज दाखिल करने के लिए अंतिम अवसर के रूप में एक सप्ताह का समय और दिया जाए। अदालत ने यह अनुरोध स्वीकार कर लिया और महाराष्ट्र सरकार को एक सप्ताह का समय देते हुए गाडलिंग को प्रति हलफनामा दाखिल करने की छूट दी। मामला अब इसके बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।

24 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा था कि ट्रायल में इतनी लंबी देरी क्यों हो रही है। पीठ ने कहा था, “ट्रायल में देरी का कारण क्या है? अभियोजन एजेंसी इसे संक्षेप में स्पष्ट करे।”

उस दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता ग्रोवर ने अदालत को बताया था कि गाडलिंग को छह साल सात महीने से अधिक समय से जेल में रखा गया है और अब तक मुकदमे की सुनवाई पूरी नहीं हुई है।

यह मामला 25 दिसंबर 2016 की उस घटना से जुड़ा है, जब कथित माओवादी विद्रोहियों ने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के सुरजगढ़ खदानों से लौह अयस्क ढोने वाले 76 वाहनों में आग लगा दी थी।

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गाडलिंग, जो नागपुर के वकील हैं, पर माओवादियों की मदद करने और अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर खनन गतिविधियों का विरोध करने की साजिश रचने का आरोप है। अभियोजन के अनुसार, उन्होंने भूमिगत माओवादियों को सरकारी गतिविधियों और कुछ क्षेत्रों के नक्शों से संबंधित गोपनीय जानकारी दी और स्थानीय लोगों को खदान संचालन का विरोध करने के लिए उकसाया।

उन पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

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