बॉम्बे हाईकोर्ट ने राज ठाकरे और मनसे कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज एफआईआर की मांग वाली जनहित याचिका की ग्राह्यता पर उठाए सवाल

बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंदी भाषी लोगों पर हमले के आरोप में एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) की ग्राह्यता (maintainability) पर सवाल उठाया।

मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखड की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता के वकील सुभाष झा से पूछा कि इस तरह की याचिका अदालत में किस आधार पर ग्राह्य हो सकती है। याचिका में मनसे की राजनीतिक मान्यता रद्द करने की भी मांग की गई है।

यह याचिका घनश्याम दयालु उपाध्याय ने जुलाई 2025 में दायर की थी। इसमें आरोप लगाया गया कि ठाकरे और उनके कार्यकर्ता 2005 से ही हिंदी भाषी राज्यों से आए प्रवासियों के खिलाफ भीड़ हिंसा में शामिल रहे हैं और इससे भारत की अखंडता, एकता और संप्रभुता को खतरा हुआ है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा अप्रैल और जून 2025 में जारी किए गए शासनादेशों (Government Resolutions) में प्राथमिक विद्यालयों में तीन भाषा नीति लागू की गई, जिसमें हिंदी भी शामिल है। इसी के बाद राज ठाकरे और उनके चचेरे भाई उद्धव ठाकरे ने हिंदी को तीसरी भाषा बनाने के विरोध में गठबंधन किया।

याचिका में दावा किया गया कि राज ठाकरे ने कई विवादित भाषण दिए, जिनमें भाषा और जन्मस्थान के आधार पर वैमनस्य फैलाया गया। उनके इशारे पर मनसे कार्यकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के लोगों पर हमले किए, उन्हें पीटा, लिंचिंग की घटनाएँ हुईं और उनकी दुकानों व व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुँचाया गया।

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याचिका में ठाकरे के बयान का उल्लेख किया गया: “राज ठाकरे ने खुलेआम कहा कि ये तो केवल ट्रेलर हैं, अगर हिंदी नहीं रोकी गई तो हिंदी भाषी लोगों को निश्चित रूप से मारा जाएगा।”

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि ठाकरे का “मराठी प्रेम मौसमी” है और वह केवल मुंबई नगर निगम चुनावों में मराठी वोटों को एकजुट करने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत सबसे पहले इस याचिका की ग्राह्यता पर विचार करेगी, तभी आगे के आरोपों को परखा जाएगा।

मामले की अगली सुनवाई याचिकाकर्ता द्वारा ग्राह्यता संबंधी सवालों का उत्तर देने के बाद होगी।

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