दिल्ली हाईकोर्ट ने लग्ज़र ग्रुप के दिवंगत देविंदर कुमार जैन की वसीयत को बरकरार रखा, बेटी की याचिका खारिज

दिल्ली हाईकोर्ट ने लग्ज़र ग्रुप के दिवंगत देविंदर कुमार जैन की 2004 की पारिवारिक वसीयत को चुनौती देने वाली उनकी बेटी प्रिया जैन की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून किसी वसीयतकर्ता (टेस्टेटर) पर असमान संपत्ति वितरण के लिए कारण दर्ज करने का कोई दायित्व नहीं डालता।

न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने वसीयत की वैधता को बरकरार रखते हुए प्रिया जैन के इस आरोप को अस्वीकार कर दिया कि दस्तावेज़ “जाली और मनगढ़ंत” है। उनकी अपील एकल न्यायाधीश के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि वसीयत का निष्पादन 1925 के भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (Indian Succession Act) की धारा 63 के अनुरूप सिद्ध हो चुका है।

पीठ ने कहा कि वसीयत का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है। अदालत ने कहा, “यह तर्क कि वसीयत का पंजीकरण होना आवश्यक है, अप्रासंगिक है। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63 पंजीकरण की आवश्यकता नहीं रखती।”

अदालत ने आगे कहा कि वसीयत का अपंजीकृत होना इसे संदेहास्पद नहीं बनाता, खासकर तब जब गवाहों में से एक ने इसके निष्पादन की पुष्टि की और उनकी गवाही लम्बी जिरह के बावजूद विश्वसनीय बनी रही।

“वसीयत विधि अनुसार सिद्ध हो चुकी है, यह किसी भी संदिग्ध परिस्थिति से मुक्त है और वसीयतकर्ता की स्वतंत्र इच्छा को दर्शाती है,” अदालत ने कहा।

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अदालत ने यह भी माना कि वसीयत प्राकृतिक उत्तराधिकार के सिद्धांतों से अलग थी और संपत्ति का अधिकांश हिस्सा एक उत्तराधिकारी को सौंपा गया, जबकि अन्य को आंशिक या पूर्ण रूप से बाहर रखा गया। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक वसीयत विधि अनुसार निष्पादित और संदेह से मुक्त है, असमान वितरण के कारण दर्ज करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।

पीठ ने कहा, “कानून वसीयतकर्ता पर असमान बंटवारे के कारण दर्ज करने का कोई दायित्व नहीं डालता, बशर्ते दस्तावेज़ विधिसम्मत रूप से सिद्ध और संदिग्ध परिस्थितियों से मुक्त हो।”

के आदेश को चुनौती देते हुए कहा था कि न्यायाधीश ने महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी की और प्रमाण के स्थापित मानकों व सिद्धांतों के विपरीत निर्णय दिया।

लग्ज़र ग्रुप के मुखिया रहे देविंदर कुमार जैन का मार्च 2014 में निधन हो गया था।

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