सुप्रीम कोर्ट ने यस बैंक लिमिटेड, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसके तहत बैंक के 8,415 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के एडिशनल टियर-1 (एटी-1) बॉन्ड्स को पूरी तरह बट्टे खाते में डालने (राइट-डाउन करने) के फैसले को रद्द कर दिया गया था। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने स्पष्ट किया कि यस बैंक के प्रशासक ने अपने कानूनी अधिकारों से बाहर जाकर यह कदम उठाया था। अदालत ने माना कि यह कार्रवाई वैधानिक पुनर्गठन योजना और आरबीआई के मास्टर सर्कुलर के प्रावधानों के विपरीत थी। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि इन बॉन्ड्स पर सालाना कूपन दर के भुगतान की देनदारी इन्फॉर्मेशन मेमोरेंडम के नियमों के मुताबिक पूरी तरह बरकरार रहेगी।
मामले की पृष्ठभूमि और यस बैंक का वित्तीय संकट
यस बैंक ने बेसल-3 नियमों के तहत दो चरणों में गैर-परिवर्तनीय डिबेंचर के रूप में एटी-1 बॉन्ड्स जारी किए थे। इसमें 23 दिसंबर, 2016 को 3,000 करोड़ रुपये और 18 अक्टूबर, 2017 को 5,415 करोड़ रुपये के बॉन्ड्स शामिल थे। इनके लिए एक्सिस ट्रस्टी सर्विसेज लिमिटेड को डिबेंचर ट्रस्टी नियुक्त किया गया था। इसके बाद बैंक की वित्तीय स्थिति लगातार खराब होती चली गई। 31 दिसंबर, 2019 तक बैंक का कॉमन इक्विटी टियर 1 (सीईटी-1) अनुपात गिरकर महज 0.6 प्रतिशत रह गया, जबकि अनिवार्य विनियामक सीमा 7.375 प्रतिशत थी।
पूंजी जुटाने के सभी प्रयास विफल होने के बाद, केंद्र सरकार ने बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 45 के तहत 5 मार्च, 2020 को यस बैंक पर मोरेटोरियम (अस्थायी रोक) लगा दिया। उसी दिन आरबीआई ने कानून की धारा 36एसीए के तहत यस बैंक के निदेशक मंडल को हटाकर बैंक के कामकाज की देखरेख के लिए एक प्रशासक नियुक्त कर दिया। 6 मार्च, 2020 को जारी ड्राफ्ट पुनर्गठन योजना में एटी-1 बॉन्ड्स को स्थायी रूप से बट्टे खाते में डालने का स्पष्ट प्रावधान रखा गया था। हालांकि, बॉन्डधारकों की आपत्तियों के बाद 13 मार्च, 2020 को अधिसूचित अंतिम ‘यस बैंक लिमिटेड पुनर्गठन योजना, 2020’ से इस प्रावधान को पूरी तरह हटा दिया गया। इसके बावजूद प्रशासक ने अगले ही दिन यानी 14 मार्च, 2020 को एक आदेश जारी कर सभी एटी-1 बॉन्ड्स को समाप्त घोषित कर दिया और इसकी सूचना स्टॉक एक्सचेंजों को दे दी। इस निर्णय को बॉन्डधारकों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां हाईकोर्ट ने 20 जनवरी, 2023 को प्रशासक के आदेश को खारिज कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट में यस बैंक और प्रशासक के तर्क
सुप्रीम कोर्ट में यस बैंक और प्रशासक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान और बलबीर सिंह पेश हुए, जबकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आरबीआई और भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) का पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि यदि हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा गया, तो पूरी बैंकिंग प्रणाली में वित्तीय उथल-पुथल मच जाएगी और यस बैंक को उबारने के लिए किया गया पूरा पुनर्गठन प्रयास निष्फल हो जाएगा।
बैंक की ओर से कहा गया कि यस बैंक के वित्तीय स्वास्थ्य और पूंजी पर्याप्तता को बहाल करने के लिए “बेल-इन” (बॉन्ड्स को बट्टे खाते में डालना) और “बेल-आउट” (एसबीआई द्वारा पूंजी निवेश) की समन्वित रणनीति बेहद जरूरी थी। यस बैंक ने पुनर्गठन योजना के क्लॉज 6(1) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि यह प्रावधान मौजूदा अनुबंधों और शक्तियों को सुरक्षित रखता है, इसलिए प्रशासक के पास बॉन्ड्स को बट्टे खाते में डालने का अंतर्निहित अधिकार मौजूद था।
यस बैंक ने ‘पुनर्गठित बैंक’ की वैधानिक परिभाषा का हवाला देकर यह भी दलील दी कि पुनर्गठन एक सतत और लगातार चलने वाली प्रक्रिया है, जो तब तक पूरी नहीं होती जब तक योजना के तहत सभी दायित्वों का निपटारा न हो जाए। इस आधार पर बैंक ने कहा कि पुनर्गठन योजना के अमल के दौरान किसी भी समय बॉन्ड्स को बट्टे खाते में डालने का अधिकार प्रशासक के पास सुरक्षित था।
इसके विपरीत, प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी.ए. सुंदरम, डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी और नीरज किशन कौल ने दलील दी कि जब केंद्र सरकार ने अंतिम योजना से बॉन्ड्स को राइट-डाउन करने का प्रावधान जानबूझकर हटा दिया था, तब प्रशासक सरकार के इस निर्णय को नजरअंदाज नहीं कर सकता था। उन्होंने यह भी कहा कि मास्टर सर्कुलर के अनुबंध 16 के क्लॉज 2.15 के अनुसार, गैर-व्यवहार्यता के बिंदु (पीओएनवी) पर बॉन्ड्स को राइट-डाउन करने का अधिकार केवल आरबीआई के पास था, न कि प्रशासक के पास; और यह प्रक्रिया पुनर्गठन लागू होने से ठीक पहले पूरी की जानी चाहिए थी।
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की यस बैंक की दलीलें
शीर्ष अदालत ने यस बैंक की उस मांग को खारिज कर दिया जिसमें बाद के घटनाक्रमों या बैंक के वित्तीय सुधार के आधार पर मामले को देखने की बात कही गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई की वैधता को केवल 14 मार्च, 2020 के कानूनी प्रावधानों और परिस्थितियों के आधार पर ही परखा जाना चाहिए।
प्रशासक के अधिकारों को लेकर बैंक के दावों को खारिज करते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि अंतिम योजना से बॉन्ड राइट-डाउन क्लॉज को हटाना केंद्र सरकार का एक सोचा-समझा फैसला था। कोर्ट ने कहा:
“यदि केंद्र सरकार की मंशा ड्राफ्ट योजना से संबंधित प्रावधान को हटाने के बाद भी पुनर्गठन योजना प्रकाशित होने पर प्रशासक को एटी-1 बॉन्ड्स को बट्टे खाते में डालने की अनुमति देने की होती, तो उस पर गुप्त रूप से काम करने और जनता के साथ धोखाधड़ी करने का आरोप लग सकता था। 3 मार्च, 2020 के बाद के घटनाक्रमों को देखते हुए हम एक क्षण के लिए भी यह नहीं मान सकते कि केंद्र सरकार का इरादा एटी-1 बॉन्ड्स को बट्टे खाते में डलवाने का था। इसके विपरीत, यह प्रशासक थे, जिन्होंने हमारी राय में इस गलतफहमी या भ्रम के तहत काम किया कि पुनर्गठन योजना के तहत यस बैंक का पुनर्गठन होने के बावजूद, उनके पास एटी-1 बॉन्ड्स को बट्टे खाते में डालने का अधिकार बना हुआ था। हमारी राय में, यह एक अनुचित कदम था और पुनर्गठन योजना के साथ पठित मास्टर सर्कुलर के अधिकारों से बाहर (अल्ट्रा वायर्स) था।”
यस बैंक द्वारा सामान्य बचत प्रावधानों के सहारे अपनी कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश पर अदालत ने कहा कि “जो शक्ति स्पष्ट रूप से प्रदान नहीं की गई है, उसे किसी सामान्य या सर्वसमावेशी बचत प्रावधान के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से निहित नहीं माना जा सकता।”
बैंक के इस तर्क पर कि पुनर्गठन प्रक्रिया पूरी होने तक किसी भी समय बॉन्ड्स को बट्टे खाते में डाला जा सकता है, अदालत ने मास्टर सर्कुलर के क्लॉज 2.15 में प्रयुक्त ‘पुनर्गठन से पहले’ शब्द की व्याख्या की। पीठ ने कहा:
“श्री दीवान द्वारा सुझाए गए तरीके से इस क्लॉज के मौजूदा स्वरूप को पढ़ने से न केवल एटी-1 बॉन्ड्स का मूल उद्देश्य विफल हो जाएगा, बल्कि यह एक विचित्र स्थिति पैदा करेगा, जिससे निवेशक यह सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि उन पर अंतिम प्रहार कब होगा।”
अदालत ने लक्ष्मी विलास बैंक लिमिटेड और डीबीएस बैंक इंडिया लिमिटेड के एकीकरण का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां टियर-2 बॉन्ड्स को 26 नवंबर, 2020 को राइट-डाउन किया गया था, यानी 27 नवंबर, 2020 को एकीकरण योजना प्रभावी होने से एक दिन पहले।
बैंकिंग विनियमन अधिनियम की धारा 36एसीए की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने माना कि प्रशासक केवल निदेशक मंडल की जगह लेता है और वह आरबीआई के वैधानिक विनियामक अधिकारों को खुद नहीं हथिया सकता। पीठ ने कहा:
“प्रशासक आरबीआई की विनियामक भूमिका को खुद नहीं अपना सकता था और न ही उस अधिकार का उपयोग कर सकता था जो उसके पास था ही नहीं।”
हालांकि अदालत ने माना कि वित्तीय पुनरुद्धार के लिए बेल-इन और बेल-आउट आवश्यक हो सकते थे, लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की कि “केवल आवश्यकता के आधार पर उस प्रक्रिया और तरीके को दरकिनार नहीं किया जा सकता, जिसके तहत बॉन्ड्स को बट्टे खाते में डाला जाना चाहिए था।”
यस बैंक के आचरण और खुदरा बिक्री पर गंभीर टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने यस बैंक और संबंधित विनियामक संस्थाओं के आचरण पर गंभीर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने रेखांकित किया कि बैंक ने शुरुआती चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया और अत्यधिक जोखिम वाले संस्थागत बॉन्ड्स को नियमों का उल्लंघन कर व्यक्तिगत खुदरा निवेशकों को बेच दिया:
“आरबीआई, प्रशासक और निश्चित रूप से यस बैंक की इस तिकड़ी द्वारा 8,415 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के बॉन्ड्स के मामले में अपनाया गया रुख, हल्के शब्दों में कहें तो, संदेहास्पद है। निवेशकों को ऐसे गैर-जरूरी जोखिम में डालने से आसानी से बचा जा सकता था। एटी-1 बॉन्ड्स का उद्देश्य बेहद महत्वपूर्ण है: यह बैंक को पूरी तरह ध्वस्त होने से बचाने के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में काम करता है। यह उद्देश्य पूरा हो सकता था यदि आरबीआई और यस बैंक ने मास्टर सर्कुलर की शर्तों के अनुसार काम किया होता। आरबीआई महज एक मूकदर्शक बना रहा, जिसने यस बैंक के सीईटी-1 अनुपात को 0.6% के चौंकाने वाले निचले स्तर तक गिरने दिया, जबकि यस बैंक का कामकाज गुप्त और संदिग्ध तरीके से चल रहा था।”
कोर्ट ने व्यक्तिगत निवेशकों को उच्च जोखिम वाले बॉन्ड्स बेचे जाने पर यस बैंक की तीखी खिंचाई करते हुए कहा:
“हालांकि, हम पाते हैं कि यस बैंक ने मास्टर सर्कुलर का उल्लंघन करते हुए इन उपकरणों को न केवल अनुमति दी बल्कि व्यक्तिगत निवेशकों को सक्रिय रूप से बेचा भी… व्यक्तिगत निवेशकों को ऐसी उच्च-जोखिम वाली प्रतिभूतियों की ओर आकर्षित करने से पहले अधिक कड़ी जांच की जानी चाहिए थी।”
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए यस बैंक, आरबीआई और केंद्र सरकार की सभी अपीलों को खारिज कर दिया और पूर्व में दिए गए सभी अंतरिम आदेशों को निष्प्रभावी कर दिया। पीठ ने निर्देश दिया कि एटी-1 बॉन्ड्स पर वार्षिक कूपन दर के भुगतान पर इस मुकदमेबाजी का कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा और इसका भुगतान इन्फॉर्मेशन मेमोरेंडम की शर्तों के अनुसार अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। सभी पक्षों को मुकदमे का खर्च स्वयं वहन करने का आदेश दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: यस बैंक लिमिटेड एवं अन्य बनाम एक्सिस ट्रस्टी सर्विसेज लिमिटेड एवं अन्य वाद
संख्या: सिविल अपील संख्या 3182/2025 (सिविल अपील संख्या 3193-3202/2025, 3183-3192/2025, और 3203-3212/2025 के साथ)
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 15 अक्टूबर, 2026

