उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मंगलवार को पूर्व विधायक सुरेश राठौर को सोशल मीडिया पर कथित मानहानिपूर्ण सामग्री प्रसारित करने के मामले में दर्ज कई एफआईआर से जुड़े प्रकरण में गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण प्रदान किया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकल पीठ ने राठौर द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया, जिसमें उन्होंने हरिद्वार जिले में 24 दिसंबर 2025 को दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। यह एफआईआर भारतीय दंड संहिता की नई व्यवस्था भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 248(बी) (हानि पहुंचाने के उद्देश्य से झूठे आरोप) और धारा 336(4) (मानहानि की नीयत से जालसाजी) के तहत दर्ज की गई थी।
एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि सुरेश राठौर और एक अन्य सह-आरोपी ने शिरोमणि गुरु रविदास शिव महापीठ के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष दुश्यंत कुमार गौतम की छवि को धूमिल करने की नीयत से सोशल मीडिया पर जानबूझकर भ्रामक और झूठी सामग्री प्रसारित की। इस सामग्री से रविदास समाज की भावनाएं आहत हुईं और सामाजिक वैमनस्य का माहौल उत्पन्न हुआ।
पूर्व विधायक राठौर ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उन्हें राजनीतिक प्रतिशोध के तहत फंसाया जा रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सह-आरोपी उर्मिला उनकी विधिक पत्नी नहीं हैं और वायरल हुई सामग्री कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के माध्यम से बनाई गई थी, जिसमें उनकी कोई भूमिका नहीं है।
राठौर की ओर से पेश अधिवक्ता वैभव चौहान ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ न तो कोई झूठी आपराधिक कार्रवाई की गई है और न ही किसी प्रकार की जालसाजी, ऐसे में भारतीय न्याय संहिता की धारा 248(बी) और 336(4) के तहत कोई अपराध बनता ही नहीं है।
सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने राठौर को अंतरिम राहत देते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर में किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने यह भी ध्यान में लिया कि हरिद्वार और देहरादून जिलों में एक जैसी प्रकृति की एफआईआर दर्ज की गई हैं, जो एक ही आरोपों की पुनरावृत्ति प्रतीत होती है।
अब इस मामले में आगे की सुनवाई में यह तय किया जाएगा कि इन एफआईआर को रद्द किया जाना चाहिए या नहीं।

