उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सोमवार को राज्य सरकार को निर्देश दिया कि साबुन पत्थर (खैरा) खनन में लगे सभी वाहनों में जीपीएस उपकरण अनिवार्य रूप से लगाए जाएं और उन्हें रामन्ना पोर्टल से जोड़ा जाए, ताकि वास्तविक समय पर उनका ट्रैक रिकॉर्ड किया जा सके। यह आदेश बागेश्वर जिले के कांडा तहसील में हो रहे अवैध खनन से जुड़ी जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया।
मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले में गंभीर पर्यावरणीय क्षति और ग्रामीणों की आजीविका पर प्रभाव को देखते हुए सुनवाई की और मामले की अगली तारीख अगले दिन निर्धारित की।
कांडा तहसील के ग्रामीणों ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि खैरों की अवैध खुदाई से उनके खेत बर्बाद हो गए हैं, मकानों में दरारें पड़ गई हैं और पीने के पानी की पाइपलाइनें भी टूट चुकी हैं। ग्रामीणों ने बताया कि जो लोग संपन्न थे वे हल्द्वानी और अन्य जगहों पर जाकर बस गए हैं, जबकि गांवों में अब केवल गरीब ही बचे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने कई बार अधिकारियों को शिकायतें सौंपीं, लेकिन कोई समाधान नहीं मिला, जिसके चलते उन्हें अदालत का रुख करना पड़ा।
सुनवाई के दौरान जिला खनन अधिकारी, बागेश्वर द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में खनिज परिवहन में गंभीर अनियमितताओं का खुलासा हुआ। रिपोर्ट में बताया गया कि कई मामलों में 55 किलोमीटर की दूरी तय करने में वाहनों ने 12 से 18 घंटे का समय दिखाया, जो व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
अदालत ने कहा कि ऐसी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए वाहनों की जीपीएस ट्रैकिंग और रामन्ना पोर्टल से डेटा एकीकरण बेहद जरूरी है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि जीपीएस से निगरानी की व्यवस्था एक सप्ताह के भीतर लागू की जाए और राज्य सरकार इसकी पूर्ण अनुपालना सुनिश्चित करे।
यह मामला उत्तराखंड के पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित खनन के सामाजिक और पारिस्थितिक प्रभावों को उजागर करता है, खासकर उन जिलों में जहां निगरानी और प्रशासनिक व्यवस्था कमजोर है।

