चार्ज पर हस्ताक्षर न होना एक ‘सुधार योग्य त्रुटि’, इसके आधार पर दोबारा ट्रायल का आदेश देना गलत: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि औपचारिक आरोप (चार्ज) पर हस्ताक्षर न होना जैसी प्रक्रियात्मक चूक कोई ऐसी बुनियादी अवैधता नहीं है जो पूरे आपराधिक मुकदमे को रद्द कर दे। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) के तहत ऐसी कमियां सुधार योग्य हैं, जब तक कि उनसे ‘न्याय की विफलता’ (failure of justice) न हुई हो।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें 19 साल पुराने हत्या के मामले में ‘डे नोवो ट्रायल’ (नए सिरे से मुकदमा) चलाने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बहाल कर दिया जिसमें मुकदमे को वर्तमान चरण से ही आगे बढ़ाने को कहा गया था। कोर्ट ने टिप्पणी की कि 14 साल तक गवाही दर्ज होने और मुख्य गवाहों की मृत्यु के बाद नए सिरे से ट्रायल का आदेश देना न्याय के उद्देश्य को विफल कर देगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 4 जनवरी 2007 को दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) सहित अन्य गंभीर धाराओं के तहत नौ आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। आरोप था कि जमीन विवाद को लेकर आरोपियों ने गोलीबारी की, जिसमें नाहर सिंह नामक व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी।

साल 2009 में ट्रायल कोर्ट ने औपचारिक आरोप तैयार किए थे, लेकिन एक आरोपी की अनुपस्थिति के कारण उस दिन दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर नहीं हो सके। 1 जून 2009 को कोर्ट ने रिकॉर्ड किया कि सभी आरोपियों और उनके वकील की उपस्थिति में आरोप तय कर दिए गए हैं। इसके बाद अगले 14 वर्षों तक ट्रायल चला और गवाहों से विस्तृत जिरह की गई।

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साल 2024 में, जब मामला धारा 313 Cr.P.C. के तहत आरोपियों के बयान दर्ज करने के चरण में था, तब यह ध्यान में आया कि आरोप पत्र के दस्तावेज़ पर अनजाने में हस्ताक्षर नहीं हुए थे। ट्रायल कोर्ट ने 11 सितंबर 2024 को इस कमी को दूर करने के लिए नए सिरे से आरोप तय किए, लेकिन यह अनुमति दी कि मुकदमा मौजूदा सबूतों के आधार पर ही आगे बढ़ेगा। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसे खारिज करते हुए नए सिरे से ट्रायल शुरू करने का आदेश दे दिया था।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (मृतक का पुत्र) और उत्तर प्रदेश राज्य ने तर्क दिया कि आरोपियों को आरोपों की पूरी जानकारी थी और उन्होंने एक दशक से अधिक समय तक ट्रायल में हिस्सा लिया। उन्होंने दलील दी कि ‘डे नोवो ट्रायल’ से अभियोजन पक्ष को अपूरणीय क्षति होगी क्योंकि दो मुख्य प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की मृत्यु हो चुकी है। उन्होंने धारा 464 Cr.P.C. का हवाला देते हुए कहा कि आरोपों में त्रुटियां सुधार योग्य होती हैं।

वहीं, प्रतिवादियों (आरोपियों) ने तर्क दिया कि हस्ताक्षर न होना और धारा 228 Cr.P.C. (आरोप तय करना) का पालन न करना एक ऐसी गंभीर अवैधता है जिसे सुधारा नहीं जा सकता। उन्होंने दावा किया कि 2024 में नए आरोप तय होने के बाद, उन्हें नए सिरे से ट्रायल और डिस्चार्ज की मांग करने का वैधानिक अधिकार मिल गया है।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि क्या चार्ज साइन न होना एक ‘न्यायिक अवैधता’ है या ‘सुधार योग्य अनियमितता’।

1. प्रक्रियात्मक तकनीकी बनाम न्याय का उद्देश्य पीठ ने कहा कि आरोप तय करने का उद्देश्य आरोपी को उसके खिलाफ लगे आरोपों की सूचना देना है। विली (विलियम) स्लेनी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1956) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

“संहिता प्रक्रिया का एक कानून है और सभी प्रक्रियात्मक कानूनों की तरह, इसे न्याय के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए बनाया गया है, न कि अंतहीन तकनीकीताओं के माध्यम से उन्हें विफल करने के लिए।”

2. पूर्वाग्रह का अभाव पीठ ने पाया कि आरोपियों ने 14 साल तक मुकदमे में सक्रिय रूप से भाग लिया और गवाहों से जिरह की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी ट्रायल को केवल तभी दूषित माना जा सकता है जब आरोपी के अधिकारों को वास्तविक नुकसान (prejudice) हुआ हो।

“चार्ज पर हस्ताक्षर न होना एक प्रक्रियात्मक चूक है, लेकिन यह कार्यवाही को तब अवैध नहीं बनाती जब चार्ज वास्तव में तैयार किया गया था, पढ़कर सुनाया गया था और कोर्ट व पक्षों द्वारा उस पर अमल किया गया था।”

3. धारा 215 और 464 Cr.P.C. की भूमिका कोर्ट ने कहा कि धारा 464 Cr.P.C. के तहत चार्ज में किसी भी गलती या चूक के आधार पर तब तक किसी आदेश को अवैध नहीं माना जाएगा जब तक कि ‘न्याय की विफलता’ साबित न हो जाए। इस मामले में ऐसी कोई विफलता नहीं पाई गई।

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4. ‘डे नोवो ट्रायल’ पर सावधानी पीठ ने जोर देकर कहा कि ‘डे नोवो ट्रायल’ केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दिया जाना चाहिए।

“ऐसी परिस्थितियों में नए सिरे से ट्रायल का आदेश देना अभियोजन पक्ष को महत्वपूर्ण साक्ष्यों से वंचित कर देगा और न्याय की रक्षा करने के बजाय उसे पराजित करेगा।”

कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 18 फरवरी 2025 के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के 7 अक्टूबर 2024 के आदेश को बहाल करते हुए निर्देश दिया कि मुकदमा धारा 313 के चरण से ही आगे बढ़ाया जाए और इसे शीघ्रता से संपन्न किया जाए।

मामले का विवरण

  • केस टाइटल: संदीप यादव बनाम सतीश और अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 1617/2026
  • पीठ: जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन
  • तारीख: 25 मार्च, 2026

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