न्यायिक निर्णय प्रक्रिया पर हावी न हो तकनीक, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस राजेश बिंदल की चेतावनी

भारतीय न्याय व्यवस्था में तकनीक के बढ़ते दखल के बीच सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस राजेश बिंदल ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल उपकरणों का उपयोग केवल सहायक के रूप में होना चाहिए और इन्हें कभी भी मानवीय न्यायिक विवेक (Judicial Reasoning) पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

जस्टिस बिंदल ने ये विचार ‘ज्यूडिशियल प्रोसेस री-इंजीनियरिंग एंड डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान साझा किए। 11-12 अप्रैल को आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य न्यायपालिका के भविष्य में तकनीक की भूमिका को परिभाषित करना था, जिसका आयोजन सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी और भारत सरकार के न्याय विभाग द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था।

सम्मेलन के दूसरे दिन एक सत्र की अध्यक्षता करते हुए जस्टिस बिंदल ने कानूनी प्रक्रियाओं में ऑटोमेशन (स्वचालन) के बढ़ते प्रभाव पर चर्चा की। उन्होंने स्वीकार किया कि डिजिटल बदलाव से दक्षता बढ़ती है, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का मूल—यानी निर्णय लेना और तर्क करना—पूरी तरह से मानवीय हाथों में होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, जस्टिस बिंदल ने कहा, “AI और डिजिटल टूल्स का उपयोग सहायक उपकरणों के रूप में किया जाना चाहिए, इन्हें न्यायिक तर्क पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

सिद्धांतों के साथ-साथ जस्टिस बिंदल ने व्यावहारिक सुरक्षा जोखिमों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने न्यायिक ढांचे के भीतर ‘ओपन-सोर्स’ प्लेटफॉर्म के उपयोग पर चिंता जताई और कहा कि इससे डेटा की गोपनीयता और संवेदनशील कानूनी दस्तावेजों को खतरा हो सकता है।

यह सम्मेलन देश के शीर्ष न्यायविदों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ, जिसमें विभिन्न हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों, न्यायाधीशों, आईटी समितियों के सदस्यों और केंद्रीय परियोजना समन्वयकों ने भाग लिया। सम्मेलन को पांच कार्य सत्रों में विभाजित किया गया था:

  • पहला दिन: पहले दिन के तीन सत्रों में विशेषज्ञों ने न्यायिक प्रक्रियाओं के रूपांतरण और तकनीक के माध्यम से न्याय वितरण प्रणाली की कमियों को दूर करने पर गहन चर्चा की।
  • दूसरा दिन: जस्टिस बिंदल ने तकनीकी सहायता पर चौथे सत्र का नेतृत्व किया, जबकि पांचवें सत्र की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने की। इस सत्र में विभिन्न हाईकोर्ट द्वारा लागू किए गए प्रमुख तकनीकी नवाचारों को प्रदर्शित किया गया।
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सम्मेलन का समापन जस्टिस जे.के. माहेश्वरी के समापन संबोधन के साथ हुआ। उन्होंने न्यायिक सुधारों को जारी रखने के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि न्याय वितरण प्रणाली को आधुनिक और कुशल बनाने के लिए तकनीकी प्रगति एक अनिवार्य आधार है।

यह सम्मेलन आधुनिकीकरण के प्रति सुप्रीम कोर्ट की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, साथ ही यह उन सीमाओं को भी स्पष्ट करता है जो कानून की अखंडता और गोपनीयता की रक्षा के लिए आवश्यक हैं।

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