इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या उसने मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (जैसा कि 2017 में संशोधित हुआ है) को राज्य के विभिन्न शैक्षिक संस्थानों में लागू करने के लिए कोई अधिसूचना जारी की है? यदि हां, तो उसके तहत क्या कदम उठाए गए हैं, इस पर एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने सनबीम वीमेंस कॉलेज द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कॉलेज ने राष्ट्रीय महिला आयोग के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें एक महिला कर्मचारी की पुनर्नियुक्ति और उसे मातृत्व लाभ देने के निर्देश दिए गए थे।
कॉलेज की ओर से यह दलील दी गई कि मातृत्व लाभ अधिनियम स्वतः शैक्षिक संस्थानों पर लागू नहीं होता जब तक कि राज्य सरकार इसकी अधिसूचना न जारी करे। अधिनियम की धारा 2(1) के प्रोवाइज़ो के अनुसार, किसी ऐसे प्रतिष्ठान पर अधिनियम लागू करने के लिए राज्य सरकार को केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति से राजपत्र में अधिसूचना जारी करनी होती है।
कॉलेज ने तर्क दिया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी तक कोई ऐसी अधिसूचना जारी नहीं की है, इसलिए यह अधिनियम उस पर लागू नहीं होता।
पीठ ने यह विचार व्यक्त किया कि “राज्य सरकार इस अधिनियम को अधिसूचित करने के लिए बाध्य थी ताकि विभिन्न प्रतिष्ठानों में कार्यरत लोगों को इसका लाभ मिल सके।” कोर्ट ने संकेत दिया कि जब तक सरकार स्पष्ट रूप से अधिसूचना जारी नहीं करती, तब तक शैक्षिक संस्थानों में अधिनियम की वैधानिकता स्पष्ट नहीं होगी।
3 फरवरी को पारित आदेश में हाईकोर्ट ने सभी प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत काउंटर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च को तय की गई है।

