सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत अंशकालिक (Part-time) इंस्ट्रक्टरों के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिक्षकों से मात्र 7,000 रुपये के निश्चित मानदेय पर काम कराना और उसे वर्षों तक न बढ़ाना संविधान के अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है और यह ‘बेगार’ (Forced Labour) की श्रेणी में आता है।
न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इंस्ट्रक्टरों को शैक्षणिक सत्र 2017-18 से 17,000 रुपये प्रति माह का मानदेय प्रदान करें।
क्या था पूरा विवाद?
यह मामला सर्व शिक्षा अभियान (अब समग्र शिक्षा योजना) के तहत उत्तर प्रदेश के उच्च प्राथमिक विद्यालयों (कक्षा 6 से 8) में नियुक्त अंशकालिक इंस्ट्रक्टरों से जुड़ा है। वर्ष 2013 में जारी एक शासनादेश के तहत कला, शारीरिक शिक्षा और कार्य शिक्षा पढ़ाने के लिए 11 महीने के अनुबंध पर 7,000 रुपये प्रति माह के मानदेय पर इनकी नियुक्ति की गई थी।
अनुबंध की शर्तें बेहद सख्त थीं। इसमें स्पष्ट लिखा था कि ये इंस्ट्रक्टर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कहीं और कोई भी पार्ट-टाइम या फुल-टाइम नौकरी नहीं कर सकते। हालांकि इनका अनुबंध हर साल नवीनीकृत (Renew) होता रहा, लेकिन मानदेय में कोई सम्मानजनक वृद्धि नहीं हुई।
वर्ष 2017-18 में केंद्र सरकार के प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड (PAB) ने मानदेय बढ़ाकर 17,000 रुपये करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। राज्य सरकार ने इसे स्वीकार भी किया, लेकिन बाद में इसे घटाकर 9,800 रुपये कर दिया और वास्तव में भुगतान केवल 8,470 रुपये का किया गया। स्थिति तब और खराब हो गई जब 2019-20 में मानदेय को वापस घटाकर 7,000 रुपये कर दिया गया।
इंस्ट्रक्टर वेलफेयर एसोसिएशन और अन्य शिक्षकों ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने केवल 2017-18 के लिए 17,000 रुपये देने का आदेश दिया था, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ: ‘अंशकालिक’ कहना छलावा है
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया कि ये केवल ‘अंशकालिक’ और ‘संविदा’ कर्मचारी हैं। पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जब सरकार ने इन इंस्ट्रक्टरों के कहीं और नौकरी करने पर रोक लगा रखी है, तो उन्हें ‘अंशकालिक’ कहना पूरी तरह से भ्रामक है। वे वास्तव में पूर्णकालिक शिक्षकों (De facto full-time teachers) की तरह ही कार्य कर रहे हैं।
कोर्ट ने कहा कि 10 साल से अधिक समय तक लगातार सेवा देने के बाद, उनकी नियुक्ति ने एक प्रकार का स्थायी स्वरूप ले लिया है।
संविधान के अनुच्छेद 23 का उल्लंघन
न्यायमूर्ति पंकज मिथल ने फैसले में लिखा कि आर्थिक मजबूरियों का फायदा उठाकर किसी से न्यूनतम वेतन से भी कम पर काम कराना ‘बेगार’ है। कोर्ट ने कहा:
“इंस्ट्रक्टरों का मानदेय स्थायी रूप से 7,000 रुपये या 8,470 रुपये तय करना एक अनुचित प्रथा है और यह ‘बेगार’ की तरह है, जो संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत सख्त वर्जित है।”
PAB का फैसला अंतिम
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस योजना के तहत बजट और मानदेय तय करने का अंतिम अधिकार केंद्र के प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड (PAB) के पास है। जब PAB ने 2017-18 में 17,000 रुपये मानदेय मंजूर कर लिया था, तो राज्य सरकार या किसी अन्य प्राधिकारी को इसे घटाने का कोई अधिकार नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
अदालत ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए और शिक्षकों की अपील स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- बकाया भुगतान: सभी इंस्ट्रक्टर शैक्षणिक सत्र 2017-18 से 17,000 रुपये प्रति माह मानदेय पाने के हकदार हैं।
- भुगतान की समय सीमा: राज्य सरकार को पिछले बकाये (Arrears) का भुगतान आज से छह महीने के भीतर करना होगा।
- भविष्य का वेतन: राज्य सरकार 1 अप्रैल, 2026 से इंस्ट्रक्टरों को 17,000 रुपये प्रति माह का नियमित मानदेय देना शुरू करेगी।
- नियमित समीक्षा: PAB को निर्देश दिया गया है कि वह मानदेय को स्थिर न रखे, बल्कि कम से कम हर तीन साल में इसमें संशोधन करे।
- वसूली का अधिकार: राज्य सरकार पहले शिक्षकों को भुगतान करे और बाद में केंद्र सरकार के हिस्से की राशि केंद्र से वसूल सकती है (‘Pay and Recover’ का सिद्धांत)।
केस विवरण:
- केस टाइटल: यूपी जूनियर हाई स्कूल काउंसिल इंस्ट्रक्टर वेलफेयर एसोसिएशन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (और संबद्ध मामले)
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या ____ / 2026 (एस.एल.पी. (सी) संख्या 9459/2023 से उद्भूत)
- कोरम: न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले

