केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को दी चुनौती, जिसमें अविवाहित मृतक युवक के संरक्षित शुक्राणु उसके माता-पिता को सौंपने का निर्देश दिया गया था

केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस एकल न्यायाधीश के फैसले को चुनौती दी है जिसमें एक निजी अस्पताल को एक अविवाहित मृतक युवक के संरक्षित शुक्राणु (गैमीट्स) उसके माता-पिता को सौंपने का निर्देश दिया गया था ताकि वे उसके जैविक संतान की प्राप्ति के लिए उन्हें उपयोग में ला सकें।

मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने केंद्र की अपील पर सुनवाई करते हुए मृतक के माता-पिता को नोटिस जारी किया और मामला 27 फरवरी के लिए सूचीबद्ध कर दिया।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की अधिवक्ता ने तर्क दिया कि एकल न्यायाधीश का फैसला सहायक प्रजनन तकनीक (ART) और सरोगेसी से संबंधित वर्तमान कानूनों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि किसी मृतक के माता-पिता को ‘इंटेंडिंग कपल’ यानी इच्छुक दंपती नहीं माना जा सकता, जैसा कि एकल न्यायाधीश ने स्वीकार किया है।

अधिवक्ता ने यह भी बताया कि एकल न्यायाधीश के आदेश और अवमानना याचिका लंबित होने के बावजूद मृतक युवक के शुक्राणु अब तक उसके माता-पिता को नहीं सौंपे गए हैं। पीठ ने केंद्र से यह भी पूछा कि अपील दायर करने में एक वर्ष से अधिक की देरी क्यों हुई और उसका स्पष्टीकरण मांगा।

यह मामला एक ऐसे युवक से जुड़ा है जिसे वर्ष 2020 में कैंसर हुआ था। कीमोथेरेपी शुरू होने से पहले डॉक्टरों ने बताया कि इलाज के कारण वह संभवतः संतान उत्पन्न करने में असमर्थ हो सकता है। इस कारण उसने जून 2020 में दिल्ली के गंगा राम अस्पताल में अपने शुक्राणु संरक्षित करवाए।

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बाद में उसकी मृत्यु हो गई और उसके माता-पिता ने अदालत का रुख करते हुए अस्पताल से शुक्राणु जारी करने का अनुरोध किया।

4 अक्टूबर 2024 को दिए गए अपने फैसले में एकल न्यायाधीश ने कहा कि मृतक के संरक्षित शुक्राणु उसकी जैविक संपत्ति माने जाएंगे, ठीक उसी तरह जैसे मृत शरीर के अंग माने जाते हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब मृतक ने शुक्राणु संरक्षित कराए थे, उस समय उसने लिखित रूप से यह सहमति दी थी कि यह फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन (उर्वरता संरक्षण) के लिए है।

जज ने यह भी कहा था कि इस शुक्राणु के माध्यम से या तो किसी पहचानी गई सरोगेट मां के माध्यम से या किसी सहमत महिला के साथ IVF की प्रक्रिया द्वारा संतान प्राप्त की जा सकती है।

कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह सुझाव भी दिया था कि वह पोस्टमॉर्टल रिप्रोडक्शन (मृत्यु के बाद प्रजनन) से जुड़े मामलों पर किसी कानून, नीति या दिशा-निर्देश की आवश्यकता पर विचार करे।

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पोस्टह्यूमस रिप्रोडक्शन यानी किसी मृत व्यक्ति के शुक्राणु/अंडाणु से संतान उत्पन्न करने की प्रक्रिया भारत में कानूनी और नैतिक दृष्टिकोण से जटिल है। वर्तमान में लागू ART अधिनियम, 2021 और सरोगेसी अधिनियम, 2021 में जीवित व्यक्तियों के लिए प्रक्रियाएं निर्धारित की गई हैं, लेकिन मृत व्यक्ति के मामलों को लेकर स्पष्टता नहीं है।

अब यह मामला हाई कोर्ट  के समक्ष विचाराधीन है और इसके निर्णय से भारत में प्रजनन अधिकारों, जैविक उत्तराधिकार और ‘पोस्टह्यूमस चाइल्ड’ की वैधता जैसे गंभीर कानूनी मुद्दों पर मार्गदर्शन मिल सकता है।

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