बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्देश: अविवाहित महिलाओं को भी 24 सप्ताह तक गर्भपात का अधिकार, राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का व्यापक प्रचार करे

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट और नियमों की वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका का निपटारा करते हुए स्पष्ट किया है कि अविवाहित महिलाओं को भी 24 सप्ताह तक के गर्भ को समाप्त करने का अधिकार है। जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक निर्णय का हवाला देते हुए महाराष्ट्र राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिया है कि वह इस कानून का व्यापक प्रचार-प्रसार सुनिश्चित करे, ताकि अविवाहित महिलाओं को भी विवाहित महिलाओं के समान ही गर्भपात की सेवाएं मिल सकें।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका एक 26 वर्षीय अविवाहित महिला द्वारा दायर की गई थी, जिसने हाईकोर्ट का दरवाजा तब खटखटाया जब उसका गर्भ 22 सप्ताह का हो चुका था। याचिकाकर्ता ने कहा कि वह एक अवांछित गर्भावस्था (Unwanted Pregnancy) का सामना कर रही है, जो गर्भनिरोधक उपकरणों की विफलता (Failure of contraceptive device) के कारण हुई है। एक अविवाहित मां होने के नाते, उसने “सामाजिक कलंक” (Social Stigma) और परिवार के समर्थन की कमी की आशंका जताई थी।

हालांकि, हाईकोर्ट ने 23 अगस्त 2022 के अपने एक आदेश के माध्यम से सर जे.जे. ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ता को गर्भपात की अनुमति दे दी थी। लेकिन, कोर्ट ने याचिका को लंबित रखा था ताकि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 की धारा 3(2)(b) (2021 में संशोधित) और MTP नियम, 2003 के नियम 3-बी की वैधता पर उठाई गई व्यापक चुनौती पर निर्णय लिया जा सके।

कानूनी चुनौती और दलीलें

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 20 से 24 सप्ताह के बीच गर्भपात के लिए पात्र महिलाओं की श्रेणियों से अविवाहित और एकल महिलाओं (Single Women) को बाहर रखना भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है।

याचिका में कहा गया कि 2021 में पेश किए गए नियम 3-बी में यौन हमले की शिकार महिलाओं, नाबालिगों, शारीरिक रूप से विकलांग महिलाओं और मानसिक रूप से बीमार महिलाओं जैसी श्रेणियों को तो शामिल किया गया है, लेकिन इसमें उन अविवाहित महिलाओं को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है जिनकी परिस्थितियों में बदलाव आया है। याचिकाकर्ता का कहना था कि अविवाहित/एकल महिलाओं को इस अधिकार से वंचित करना उनके सम्मान के साथ जीने के अधिकार का हनन है और यह उन्हें क्रूर व अमानवीय उपचार के अधीन करता है।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

याचिका पर सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार (Union of India) के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के ‘एक्स बनाम प्रधान सचिव, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग, दिल्ली सरकार और अन्य’ (2023) 9 SCC 433 के मामले में दिए गए फैसले पर भरोसा जताया।

हाईकोर्ट ने नोट किया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मुद्दे का समाधान कर चुका है। शीर्ष अदालत ने माना था कि अधीनस्थ कानून (Subordinate Legislation) की व्याख्या मूल अधिनियम (Enabling Act) के अनुरूप होनी चाहिए। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी को उद्धृत किया जिसमें कहा गया था कि “नियम 3-बी के साथ पठित MTP एक्ट की धारा 3(2)(b) का उद्देश्य उन महिलाओं को 20 से 24 सप्ताह के बीच गर्भपात की सुविधा प्रदान करना है, जिनकी गर्भावस्था उनकी भौतिक परिस्थितियों में बदलाव के कारण अवांछित हो गई है।”

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सुप्रीम कोर्ट के तर्क को दोहराते हुए, हाईकोर्ट ने नोट किया:

“नियम 3-बी की संकीर्ण व्याख्या, जो इसे केवल विवाहित महिलाओं तक सीमित करती है, अविवाहित महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण होगी और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करेगी… कानून को इस आधार पर किसी क़ानून के लाभार्थियों का फैसला नहीं करना चाहिए कि ‘स्वीकार्य यौन संबंध’ (permissible sex) क्या है, जो संकीर्ण पितृसत्तात्मक सिद्धांतों पर आधारित हो…”

कोर्ट ने दोहराया कि अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता, गरिमा और निजता के अधिकार एक अविवाहित महिला को भी बच्चा पैदा करने या न करने का चुनाव करने का वही अधिकार देते हैं जो एक विवाहित महिला को प्राप्त है।

निर्णय और निर्देश

खंडपीठ ने कहा कि नियम 3-बी की सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई उद्देश्यपूर्ण व्याख्या (Purposive Interpretation) के आलोक में, याचिका में उठाया गया मुद्दा अब “सुलझ गया है” (Put to rest)।

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याचिकाकर्ता की इस चिंता पर कि उसके जैसी स्थिति वाली अन्य महिलाओं को बार-बार कोर्ट का दरवाजा न खटखटाना पड़े, हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 144 का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि भारत में प्रत्येक प्राधिकरण, चाहे वह नागरिक हो या न्यायिक, सुप्रीम कोर्ट की सहायता में कार्य करने के लिए बाध्य है।

याचिका का निपटारा करते हुए, कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किया:

“हालांकि, हम महाराष्ट्र राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग से अनुरोध करते हैं कि वह सुप्रीम कोर्ट के उक्त निर्णय का व्यापक प्रचार-प्रसार उन सभी पदाधिकारियों तक सुनिश्चित करे जो मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 और नियमों के कार्यान्वयन में शामिल हैं।”

केस डिटेल्स:

  • केस टाइटल: एबीसी बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य
  • केस नंबर: रिट याचिका संख्या 9782 ऑफ 2022
  • कोरम: जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे
  • याचिकाकर्ता के वकील: सुश्री क्रांति एल.सी.
  • प्रतिवादियों के वकील: श्री एम.पी. ठाकुर (एजीपी), सुश्री पूर्णिमा अवस्थी (भारत संघ)

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