दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (UAPA) की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की, जिसमें फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स ने तर्क दिया कि सरकार की आलोचना, जब तक वह हिंसा के लिए उकसाती नहीं है, उसे “भारत के प्रति असंतोष” नहीं माना जा सकता और इस आधार पर UAPA नहीं लगाया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए 17 मार्च को सूचीबद्ध किया।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने UAPA की धारा 2(1)(o)(iii) को चुनौती दी, जिसमें “भारत के प्रति असंतोष उत्पन्न करने या उत्पन्न करने का इरादा” रखने वाले कृत्य को “गैरकानूनी गतिविधि” माना गया है। उन्होंने कहा कि “डिसअफेक्शन” शब्द अस्पष्ट और अपरिभाषित है, जिससे नागरिकों, विशेषकर पत्रकारों, के सामने “असीम अनिश्चितता” की स्थिति बनती है।
उन्होंने दलील दी कि यदि कोई व्यक्ति किसी नीति की आलोचना करता है, भले ही उससे देश की छवि प्रभावित हो, तो भी जब तक वह हिंसा के लिए उकसावा नहीं देता, उसे गैरकानूनी गतिविधि नहीं कहा जा सकता।
दातार ने कहा कि वर्तमान प्रावधानों के कारण पत्रकारों में यह भय बना रहता है कि सरकार की आलोचना को “भारत के प्रति असंतोष” मानकर उनके खिलाफ UAPA लगाया जा सकता है। उन्होंने अदालत को बताया कि कई पत्रकार नीतिगत आलोचना के कारण लंबे समय से जेल में हैं।
उनके अनुसार, यह प्रावधान अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव डालता है और इसका व्यापक दुरुपयोग हुआ है।
याचिका में धारा 43D(4) के तहत अग्रिम जमानत पर पूर्ण प्रतिबंध को भी चुनौती दी गई है। साथ ही धारा 43D(5) के प्रावधान पर भी आपत्ति जताई गई, जिसके तहत अदालत पुलिस केस डायरी के आधार पर प्रथमदृष्टया मामला मानकर जमानत से इनकार कर सकती है।
दातार ने कहा कि केस डायरी साक्ष्य नहीं होती और उसका उपयोग केवल जांच एजेंसी का खंडन करने के लिए किया जा सकता है। इसके बावजूद उसी आधार पर जमानत से इनकार किए जाने से आरोपियों को 600–700 दिनों तक जेल में रहना पड़ रहा है।
याचिकाओं में निम्न प्रावधानों को भी चुनौती दी गई है:
- व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करने की शक्ति,
- संगठनों को आतंकवादी या गैरकानूनी घोषित करने की प्रक्रिया,
- संपत्ति जब्त करने के प्रावधान,
- गिरफ्तारी और जमानत पर कठोर प्रतिबंध।
ये याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट द्वारा 4 फरवरी 2025 को साजल अवस्थी, एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) और अमिताभ पांडे द्वारा दायर याचिकाओं को दिल्ली हाईकोर्ट में स्थानांतरित किए जाने के बाद एक साथ सुनी जा रही हैं।
मामले की अगली सुनवाई 17 मार्च को होगी।

