एक ही फैसले के खिलाफ अलग-अलग अपीलों में विरोधाभासी आदेश पारित नहीं किए जा सकते: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि हाईकोर्ट एक ही एकल न्यायाधीश (Single Judge) के फैसले से उत्पन्न अलग-अलग रिट अपीलों में विरोधाभासी आदेश पारित नहीं कर सकता है। शीर्ष अदालत ने तेलंगाना हाईकोर्ट की एक खंडपीठ (Division Bench) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें भूमि अधिग्रहण के मामले को पुनर्विचार के लिए वापस (Remand) भेज दिया गया था, जबकि एक अन्य खंडपीठ पहले ही उसी मामले में अधिग्रहण के निर्देश को बरकरार रख चुकी थी।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने सैयद मोहम्मद शब्बुद्दीन द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। पीठ ने कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब एक अपील में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने के निर्देश की पुष्टि कर दी है, तो बाद में दूसरी अपील में इसके विपरीत आदेश नहीं दिया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, सैयद मोहम्मद शब्बुद्दीन ने अपनी जमीन (रंगा रेड्डी जिले के राविरयाल गांव में स्थित लगभग 16 एकड़ 19 गुंटा) के अधिग्रहण के संबंध में अधिकारियों की निष्क्रियता को चुनौती देते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट में रिट याचिका (संख्या 11883/2024) दायर की थी। उनका कहना था कि अदालती आदेशों के बावजूद, अधिकारियों ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत न तो कार्यवाही शुरू की और न ही मुआवजा दिया।

4 सितंबर, 2024 को हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने उत्तरदाताओं को चार महीने के भीतर भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने और पूरा करने का निर्देश दिया। साथ ही, याचिकाकर्ता को 25 वर्षों से अधिक समय तक संपत्ति के अधिकार से वंचित रखने के लिए 1 लाख रुपये का जुर्माना (Costs) भी लगाया।

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हाईकोर्ट में विरोधाभासी कार्यवाही

एकल न्यायाधीश के इस आदेश के खिलाफ दो अलग-अलग पक्षकारों ने दो अलग-अलग अपीलें दायर कीं, जिसके कारण विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न हुई:

  1. केंद्र सरकार की अपील: केंद्र सरकार (Union of India) ने आदेश को चुनौती दी। 18 नवंबर, 2024 को एक खंडपीठ ने भूमि अधिग्रहण के निर्देश को बरकरार रखा, लेकिन 1 लाख रुपये के जुर्माने को रद्द कर दिया। केंद्र सरकार ने कोर्ट में स्वीकार किया कि वे अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने के लिए तैयार हैं।
  2. तेलंगाना राज्य की अपील: राज्य सरकार ने भी उसी आदेश के खिलाफ अपील दायर की। 12 मार्च, 2025 को एक अलग खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से विचार के लिए वापस (Remand) भेज दिया।
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और विश्लेषण

अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि जब केंद्र सरकार की अपील में हाईकोर्ट पहले ही 4 सितंबर 2024 के मूल आदेश की पुष्टि कर चुका है (सिर्फ जुर्माने को छोड़कर), और सुप्रीम कोर्ट ने भी उस पर अपनी मुहर लगा दी है, तो बाद में कोई अन्य खंडपीठ मामले को रिमांड पर भेजने का विरोधाभासी आदेश कैसे पारित कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा, “यह दोहराना आवश्यक है कि एकल न्यायाधीश द्वारा पारित 04.09.2024 के आदेश के खिलाफ अलग-अलग पक्षकारों (केंद्र और राज्य) द्वारा दायर रिट अपीलों में दो विरोधाभासी आदेश नहीं हो सकते।”

पीठ ने 12 मार्च, 2025 के रिमांड आदेश को रद्द करते हुए कहा कि राज्य सरकार अब उस आदेश की शुद्धता का दावा नहीं कर सकती, क्योंकि अधिग्रहण का निर्देश पहले ही अंतिम रूप ले चुका है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि केंद्र सरकार पहले ही जमीन अधिग्रहण के लिए अपनी सहमति जता चुकी थी।

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निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने 12 मार्च, 2025 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें मामले को रिमांड पर भेजा गया था। इसके साथ ही, अधिकारियों को भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने के निर्देश को बहाल रखा गया है।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: सैयद मोहम्मद शब्बुद्दीन बनाम भारत संघ व अन्य।
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या ____ / 2026 (एसएलपी (सी) संख्या 16393-16394 / 2025 से उद्भूत)
  • कोरम: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां

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