तेलंगाना हाईकोर्ट ने शनिवार को भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) और पूर्व सिंचाई मंत्री टी. हरीश राव की उस याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया, जिसमें उन्होंने राज्य सरकार को न्यायमूर्ति पी.सी. घोष आयोग की रिपोर्ट विधानसभा में पेश करने से रोकने की मांग की थी। इस रिपोर्ट में कालेश्वरम लिफ्ट सिंचाई परियोजना में कथित अनियमितताओं के लिए पूर्व बीआरएस सरकार को जिम्मेदार ठहराया गया है।
केसीआर और हरीश राव ने हाउस मोशन याचिकाएँ दायर कर अदालत से अनुरोध किया था कि रिपोर्ट पर चर्चा होने पर भी उनके खिलाफ कोई दमनात्मक कार्रवाई न की जाए। हालांकि, हाईकोर्ट ने इन याचिकाओं को रजिस्ट्री को भेज दिया और संकेत दिया कि इन्हें सोमवार को सूचीबद्ध किया जा सकता है।
इससे पहले 21 अगस्त को दोनों नेताओं ने अलग-अलग रिट याचिकाएँ दायर कर आयोग की रिपोर्ट को चुनौती दी थी। 22 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश अपरेश कुमार सिंह और न्यायमूर्ति जी.एम. मोहिउद्दीन की खंडपीठ ने लगातार दो दिन तक दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया था। मामला अब अक्टूबर में सुनवाई के लिए तय है। इस दौरान एडवोकेट जनरल ए. सुदर्शन रेड्डी ने अदालत को आश्वस्त किया था कि सरकार आगे की कार्रवाई केवल विधानसभा में चर्चा के बाद ही करेगी।

पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त और कानूनी विशेषज्ञ श्रीधर आचार्युलु मदभूषि ने कहा कि किसी भी विषय पर चर्चा करना पूरी तरह से विधानसभा अध्यक्ष के विवेक पर निर्भर करता है, चाहे वह रविवार को ही क्यों न हो। उन्होंने कहा, “ऐसे उदाहरण हैं जब संसद ने भी रविवार को महत्त्वपूर्ण विषयों पर बहस की है। शायद यही कारण है कि हाईकोर्ट ने केसीआर और हरीश राव की याचिकाओं को तत्काल नहीं सुना।”
इधर, बीआरएस की उस मांग को भी राज्य सरकार ने खारिज कर दिया, जिसमें पार्टी ने विधानसभा में पावर प्वॉइंट प्रस्तुति के जरिए कालेश्वरम परियोजना पर अपना पक्ष रखने की अनुमति मांगी थी। राज्य के विधायी कार्य मंत्री डी. श्रीधर बाबू ने कहा, “विपक्ष द्वारा इस तरह की प्रस्तुति देने का कोई उदाहरण नहीं है। जब बीआरएस सत्ता में थी, तब उसने भी कांग्रेस को ऐसी अनुमति नहीं दी।”