सुप्रीम कोर्ट ने विशेष शिक्षकों की नियुक्ति में देरी पर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अवमानना की चेतावनी दी

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों (UTs) को विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए योग्य शिक्षकों की नियुक्ति के संबंध में उसके निर्देशों की अनदेखी पर सख्त चेतावनी दी है और स्पष्ट किया है कि यदि अनुपालन नहीं हुआ तो अवमानना की कार्यवाही की जा सकती है।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि 7 मार्च 2025 को पारित आदेश सहित उसके पूर्व के निर्देशों का अधिकांश राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने पालन नहीं किया है। उस आदेश में सभी 36 राज्यों और UTs को 28 मार्च तक विशेष शिक्षकों के स्वीकृत पदों की जानकारी देने का निर्देश दिया गया था, जिसका चार महीने बाद भी अनुपालन नहीं हुआ।

15 जुलाई के आदेश में कोर्ट ने कहा, “यदि कोई राज्य/केंद्रशासित प्रदेश ऐसा हलफनामा दाखिल करने में विफल रहता है, तो उस राज्य/UT के शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव/सचिव को 29 अगस्त 2025 को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा और यह बताना होगा कि उनके विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।”

कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी राज्य और UT एक जिम्मेदार अधिकारी (जो उप सचिव के पद से नीचे न हो) द्वारा शपथपत्र दाखिल करें। ये हलफनामे वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा को सौंपे जाएं, जो इस मामले में न्यायालय की सहायता कर रहे हैं।

यह मामला सुप्रीम कोर्ट में राजनीश कुमार पांडे द्वारा दायर एक याचिका के माध्यम से पहुंचा, जिनकी ओर से अधिवक्ता प्रशांत शुक्ला ने पैरवी की। याचिका में उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में विशेष शिक्षकों की भारी कमी को उजागर किया गया। इसी से जुड़ी एक अन्य याचिका में 17 प्रशिक्षित विशेष शिक्षकों ने दलील दी कि नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम (Right to Education Act) की सफलता विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति पर निर्भर है।

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पीठ ने यह भी कहा कि 2021 के एक सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद अधिकांश राज्यों ने आज तक विशेष बच्चों के लिए एक भी शिक्षक नियुक्त नहीं किया है, और न ही यह निर्धारित किया है कि कितने पदों की आवश्यकता है — जबकि इन बच्चों के आंकड़े पहले से मौजूद हैं।

कोर्ट ने दोहराया कि सभी राज्यों को न केवल 28 मार्च 2025 तक विशेष शिक्षकों के पदों को स्वीकृत और अधिसूचित करना चाहिए, बल्कि इसकी सार्वजनिक सूचना भी व्यापक रूप से प्रचलित समाचार पत्रों और सरकारी वेबसाइटों पर देनी होगी।

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कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में पिछले लगभग दो दशकों से संविदा पर कार्यरत शिक्षकों पर निर्भरता बनी हुई है। इसे समाप्त करने के लिए कोर्ट ने सभी राज्यों और UTs को निर्देश दिया कि वे एक स्क्रीनिंग कमेटी गठित करें, जिसमें विकलांग व्यक्तियों के राज्य आयुक्त, शिक्षा सचिव, और रिकैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया का एक क्षेत्रीय विशेषज्ञ सदस्य शामिल हो।

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल वही शिक्षक नियुक्त किए जाएं जो योग्य, सक्षम और पात्र हों, ताकि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को संविधानिक और वैधानिक दायित्वों के अनुरूप सहायता मिल सके।

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यह मामला अब 29 अगस्त 2025 को फिर से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। यदि तब तक अनुपालन नहीं हुआ, तो अदालत अवमानना की कार्यवाही शुरू कर सकती है।

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