करीब साढ़े तीन दशक पुराने भ्रष्टाचार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के एक पूर्व आबकारी कांस्टेबल की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। हालांकि अदालत ने आरोपी की उम्र और पहले से काटी गई जेल अवधि को देखते हुए उसकी सजा में कमी करते हुए दो वर्ष के स्थान पर एक वर्ष का कारावास निर्धारित किया है।
न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति पी. बी. वराले की पीठ आरोपी द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने 2012 में उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा था जिसमें आरोपी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।
13 मार्च को पारित आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखने में कोई त्रुटि नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि और सजा के संबंध में निचली अदालतों के निष्कर्ष सही हैं।
हालांकि, अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी अब 75 वर्ष का हो चुका है और वह पहले ही दो महीने से अधिक समय जेल में बिता चुका है।
पीठ ने अपने आदेश में कहा,
“हमारे विचार में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई और हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखी गई सजा को इन अपराधों के लिए निर्धारित न्यूनतम सजा तक संशोधित किया जा सकता है।”
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक सेवक द्वारा आपराधिक दुराचार से संबंधित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत दी गई सजा को घटाकर एक वर्ष कर दिया।
यह मामला 19 जून 1990 का है, जब उधम सिंह नगर जिले में एक ट्रैप कार्रवाई के दौरान आबकारी विभाग के इस कांस्टेबल को ₹500 की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया था। इसके बाद उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई।
मामला अगले वर्ष सत्र न्यायालय में भेजा गया और लंबी सुनवाई के बाद वर्ष 2006 में ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी ठहराते हुए दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई।
इसके खिलाफ आरोपी ने उत्तराखंड हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन 2012 में हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
इस दौरान आरोपी जनवरी 2013 से जमानत पर बाहर था। अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के साथ ही उसकी दोषसिद्धि को कायम रखते हुए सजा की अवधि कम कर दी गई है।

