सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय अनुबंध अधिनियम (Indian Contract Act), 1872 की धारा 133 की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि ऋणदाता और मुख्य कर्जदार के बीच अनुबंध की शर्तों में श्योरिटी (ज़मानतदार) की सहमति के बिना बदलाव किया जाता है, तो श्योरिटी पूरी तरह से अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं होता। न्यायालय के अनुसार, श्योरिटी केवल उन लेनदेन के लिए उत्तरदायी नहीं होगा जो अनुबंध में बदलाव के बाद हुए हैं, लेकिन वह मूल रूप से गारंटी दी गई राशि के लिए जिम्मेदार बना रहेगा।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरथना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि श्योरिटी को या तो पूरी राशि के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए या बिल्कुल नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून अनुबंध में अनधिकृत संशोधन के मामलों में दायित्व के विभाजन (bifurcation) का आदेश देता है।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला 1993 का है जब ‘मैसर्स दर्शक ट्रेडिंग कंपनी’ (प्रतिवादी संख्या 6) ने ‘भाग्यलक्ष्मी को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड’ (अपीलकर्ता) से 4,00,000 रुपये की कैश-क्रेडिट सुविधा प्राप्त की थी। प्रतिवादी संख्या 1 और 2 इस ऋण के लिए श्योरिटी बने थे। बाद में यह आरोप लगाया गया कि कर्जदार ने बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से स्वीकृत सीमा से कहीं अधिक राशि निकाल ली।
कर्ज न चुकाने पर बैंक ने 26,95,196.75 रुपये की वसूली के लिए ‘लवाद सूट’ दायर किया। बोर्ड ऑफ नॉमिनीज ने मुख्य कर्जदार के खिलाफ दावा स्वीकार किया लेकिन श्योरिटी को जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। इसके बाद, ‘गुजरात स्टेट को-ऑपरेटिव ट्रिब्यूनल’ ने अपील पर सुनवाई करते हुए श्योरिटी को ब्याज के साथ मूल स्वीकृत राशि (4,00,000 रुपये) का भुगतान करने का निर्देश दिया।
हालांकि, गुजरात हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 139 के तहत श्योरिटी को डिस्चार्ज माना जाना चाहिए क्योंकि बैंक ने उनकी सहमति के बिना ओवरड्राल की अनुमति दी थी। हाईकोर्ट का तर्क था कि मूल राशि और अतिरिक्त निकाली गई राशि के बीच दायित्व का विभाजन नहीं किया जा सकता।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (बैंक) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री राघवेंद्र एस. श्रीवत्स ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने धारा 133 की गलत व्याख्या की है। उन्होंने कहा कि श्योरिटी केवल उन लेनदेन से मुक्त होता है जो बदलाव के बाद हुए हैं, लेकिन वह उस बिंदु तक के बकाया के लिए उत्तरदायी रहता है जब तक अनुबंध की शर्तों का पालन किया जा रहा था। उन्होंने राधा कांत पाल बनाम यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड और विश्वनाथ अगरवाला बनाम भारतीय स्टेट बैंक जैसे उदाहरणों का हवाला दिया।
प्रतिवादी (श्योरिटी) की ओर से: प्रतिवादियों के वकील ने अधिनियम की धारा 139 का सहारा लिया। उन्होंने तर्क दिया कि बैंक द्वारा स्वीकृत सीमा से अधिक राशि निकालने की अनुमति देना श्योरिटी के अधिकारों के विरुद्ध था और इससे कर्जदार के खिलाफ उनके कानूनी उपचार (remedy) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। उनकी दलील थी कि चूंकि अतिरिक्त ऋण उनकी जानकारी के बिना दिया गया, इसलिए वे पूरी तरह से दायित्व से मुक्त हो गए।
न्यायालय का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 133 और 139 के बीच के अंतर की समीक्षा की।
धारा 133 (अनुबंध में बदलाव) पर: कोर्ट ने कहा कि धारा 133 उन स्थितियों से निपटती है जहां श्योरिटी को “अनुबंध में बदलाव के बाद के लेनदेन के लिए डिस्चार्ज” माना जाता है। न्यायालय ने कहा:
“अनुबंध की शर्तों में बदलाव के कारण श्योरिटी के डिस्चार्ज होने का अर्थ यह है कि उसे उस चीज़ के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जिसके लिए उसने अनुबंध नहीं किया था… ऐसी स्थिति में, श्योरिटी की सहमति के बिना अनुबंध में परिवर्तन होने पर वह तत्काल प्रभाव से डिस्चार्ज हो जाता है।”
हालांकि, न्यायालय ने जोर दिया कि यह मुक्ति पूर्ण नहीं है:
“श्योरिटी केवल उन लेनदेन के संबंध में डिस्चार्ज होता है जो अनुबंध की शर्तों में बदलाव के बाद हुए थे। इस प्रकार, हाईकोर्ट का यह अवलोकन… कि श्योरिटी को या तो पूरी ऋण राशि के लिए उत्तरदायी होना चाहिए या बिल्कुल नहीं, गलत है।”
धारा 139 (उपचार में बाधा) पर: धारा 139 के तहत प्रतिवादियों की दलील पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस धारा को लागू करने के लिए ऋणदाता के कार्य से कर्जदार के विरुद्ध श्योरिटी के “अंततः मिलने वाले उपचार” (eventual remedy) को नुकसान पहुंचना चाहिए। इस मामले में कोर्ट ने पाया:
“…मुख्य कर्जदार (प्रतिवादी संख्या 6) के खिलाफ श्योरिटी (प्रतिवादी संख्या 1 और 2) के अंततः मिलने वाले उपचार में कोई बाधा या कमी नहीं आई है।”
कोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य बनाम डॉ. एम.एन. कौल मामले का भी जिक्र किया कि एक गारंटर को उसकी व्यस्तता की शर्तों से परे उत्तरदायी नहीं बनाया जाना चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मूल रूप से दी गई गारंटी भी समाप्त हो जाए।
न्यायालय का निर्णय
सर्वोच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में धारा 133 लागू होती है, न कि धारा 139। कोर्ट ने कहा कि श्योरिटी उस 4,00,000 रुपये की राशि के लिए उत्तरदायी बने रहेंगे जिसके लिए उन्होंने मूल रूप से गारंटी दी थी, साथ ही उस पर लागू होने वाला ब्याज भी देना होगा।
“हाईकोर्ट का यह मानना सही नहीं था कि गारंटर को या तो पूरी राशि का भुगतान करना होगा या बिल्कुल नहीं और दायित्व का कोई विभाजन नहीं हो सकता। यह अधिनियम की धारा 133 के विपरीत है… वे उस सीमा तक अपने दायित्व के लिए जिम्मेदार हैं जब तक कि अनुबंध में बदलाव नहीं किया गया था।”
सुप्रीम कोर्ट ने बैंक की अपील स्वीकार की और 25 जून 2008 के हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया।
- केस का शीर्षक: भाग्यलक्ष्मी को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम बबलदास अमथाराम पटेल (मृत) कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से एवं अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या 3200/2016 (2026 INSC 205)

