सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बार काउंसिलों में SC/ST वकीलों के लिए आरक्षण की याचिका ठुकराई, कहा—चुनाव शुरू होने के बाद बहुत देर से आया मामला

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई से इनकार कर दिया जिसमें अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के वकीलों को राज्य बार काउंसिलों में आरक्षण देने की मांग की गई थी। अदालत ने कहा कि जब चुनाव प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है, तब इस तरह की मांग बहुत देर से आई है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की मंशा और समय पर सवाल उठाते हुए कहा कि महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर दिए गए पिछले आदेशों को मिसाल बनाकर यह याचिका दाखिल की गई, लेकिन बिना तैयारी और उचित प्रक्रिया के।

मुख्य न्यायाधीश ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “आप हर जगह हैं—न्यायपालिका में, वकीलों में, संसद में… बार काउंसिल 1961 से है, आपने तब कुछ नहीं किया। अब जब महिलाओं के लिए कुछ हुआ, तो आप भी चाहते हैं कि थाली में परोस कर मिल जाए!”

पीठ ने स्पष्ट किया कि महिलाओं के लिए जो आदेश पारित किए गए थे, वे “आरक्षण” नहीं बल्कि “प्रतिनिधित्व” सुनिश्चित करने के लिए थे।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हमने महिलाओं को आरक्षण नहीं दिया है, सिर्फ प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया है।”

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से पहले किसी भी वैधानिक अथॉरिटी से संपर्क नहीं किया। इस वजह से अदालत इस समय कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
“आप अगली बार चुनाव में हमारे पास आइए,” CJI ने कहा।

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को बार काउंसिल ऑफ इंडिया और अन्य संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष पहले प्रतिनिधित्व देने की छूट दी।
CJI ने कहा, “हमारी महिलाओं के प्रतिनिधित्व वाले पुराने आदेश को ले जाइए और संबंधित अधिकारियों को दिखाईए। हमें उम्मीद है कि वे इस पर विचार करेंगे। लेकिन अगर वे कुछ नहीं करते, तो हम देखेंगे।”

दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बार काउंसिलों में महिला वकीलों के लिए 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व को “गैर-परक्राम्य” बताया था और कहा था कि अगर निर्वाचित प्रतिनिधित्व पूरा नहीं होता, तो को-ऑप्शन के जरिए यह पूरा किया जाए।
कोर्ट ने विकलांग वकीलों की भागीदारी बढ़ाने के लिए भी सुझाव दिए थे, जिसके बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने उनके लिए नामांकन शुल्क में कटौती की थी।

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सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST वकीलों की प्रतिनिधित्व संबंधी चिंता को गंभीर बताया, लेकिन स्पष्ट किया कि यह याचिका देर से दाखिल की गई है और वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना सीधे कोर्ट पहुंचना स्वीकार्य नहीं। अब याचिकाकर्ताओं को पहले वैधानिक मंचों से संपर्क करने की छूट दी गई है और अगली चुनाव प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप की संभावना खुली रखी गई है।

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