सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक दवा कंपनी और उसके अधिकारियों को जारी समन को रद्द करने से इनकार कर दिया, जिन पर “मानक गुणवत्ता के नहीं” पाए गए कफ सिरप के निर्माण और बिक्री का आरोप है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों से देश की छवि पर गंभीर असर पड़ता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप से इनकार किया, जिसमें गौतम बुद्ध नगर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जनवरी 2024 में जारी समन को सही ठहराया गया था।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कंपनी से कहा,
“क्या आपको एहसास है कि इससे देश की छवि को कितना नुकसान हुआ है?”
पीठ ने यह भी टिप्पणी की,
“सिर्फ पैसे के लिए आप ऐसा करते हैं? इससे राष्ट्र की छवि धूमिल होती है।”
नोएडा में एक औषधि निरीक्षक द्वारा दायर शिकायत में आरोप लगाया गया था कि संबंधित कंपनी ने ऐसी दवाओं का निर्माण और बिक्री की जो “मानक गुणवत्ता की नहीं” थीं। शिकायत में औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के तहत मिलावटी और नकली दवाओं, प्रक्रिया संबंधी उल्लंघनों तथा कंपनी अधिकारियों की दायित्व से संबंधित प्रावधानों को भी लागू किया गया।
इस शिकायत पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने जनवरी 2024 में कंपनी और उसके कुछ अधिकारियों को समन जारी किया था।
कंपनी और उसके अधिकारियों ने इस समन को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन एक परीक्षण विश्लेषण रिपोर्ट पर आधारित है, जिसमें नमूनों को “मानक गुणवत्ता का नहीं” पाया गया है, और मजिस्ट्रेट के समन आदेश में कोई अवैधता या त्रुटि नहीं है।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से कहा गया था कि कंपनी द्वारा निर्मित कफ सिरप उज्बेकिस्तान में विषैला पाया गया था, जिससे 18 से अधिक बच्चों की मौत हुई।
सुप्रीम कोर्ट में कंपनी की ओर से कहा गया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो कि सिरप के सेवन से मौतें हुईं।
पीठ ने इस चरण पर तथ्यात्मक विवादों में जाने से इनकार करते हुए समन आदेश को रद्द करने से मना कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम के तहत आपराधिक कार्यवाही जारी रहेगी। मामला अब गौतम बुद्ध नगर की ट्रायल कोर्ट में कानून के अनुसार आगे बढ़ेगा।

