निर्धारित समय में औद्योगिक प्लॉट का विकास न करना लीज रद्द करने का ठोस आधार: सुप्रीम कोर्ट ने UPSIDA के खिलाफ पियाजियो की अपील खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर में 33 एकड़ के एक औद्योगिक प्लॉट की लीज रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई आवंटन प्राप्तकर्ता निर्धारित समय सीमा के भीतर निर्माण कार्य पूरा करने और उत्पादन शुरू करने में विफल रहता है, तो संबंधित प्राधिकरण को लीज रद्द करने का पूरा अधिकार है। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की तीन सदस्यीय बेंच ने ‘पियाजियो व्हीकल्स प्राइवेट लिमिटेड’ (अपीलकर्ता कंपनी) की अपील को खारिज करते हुए कहा कि औद्योगिक भूमि रियायती दरों पर आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए दी जाती है, न कि उसे खाली रखने के लिए।

अदालत ने उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (UPSIDA) के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि अपीलकर्ता का आचरण “उदासीन” और “लापरवाह” था। इसी के साथ कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2009 के उस आदेश की पुष्टि की, जिसमें कंपनी की याचिका को खारिज कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

विवादित प्लॉट (प्लॉट नंबर A-1, साइट-बी, सूरजपुर औद्योगिक क्षेत्र) मूल रूप से 1985 में आवंटित किया गया था। विभिन्न हस्तांतरणों और कंपनियों के विलय के बाद, यह लीज पियाजियो कंपनी के पास आई। जुलाई 2007 में कंपनी का नाम बदलने के कारण एक नई लीज डीड निष्पादित की गई थी, लेकिन कोर्ट ने नोट किया कि 2002 की मूल लीज डीड में निर्धारित शर्तें और उत्तरदायित्व अपरिवर्तित रहे थे।

25 अगस्त 2008 को UPSIDA ने लीज रद्द कर दी थी क्योंकि कंपनी ने न तो फैक्ट्री का निर्माण पूरा किया था और न ही लीज डीड की धारा 3(o) के तहत छह महीने की निर्धारित अवधि के भीतर उत्पादन शुरू किया था।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (पियाजियो) की दलीलें: कंपनी की ओर से सीनियर एडवोकेट अमर दवे ने तर्क दिया कि कंपनी इकाई स्थापित करने की इच्छुक थी, लेकिन महाराष्ट्र के बारामती स्थित अपने अन्य प्लांट में तेजी से विस्तार करने के दबाव के कारण वह सूरजपुर (उत्तर प्रदेश) में समय पर काम शुरू नहीं कर सकी। उन्होंने कहा कि कंपनी ने वहां टेस्टिंग सुविधा स्थापित की थी और लगभग ₹27.89 करोड़ का निवेश किया था। अपीलकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि UPSIDA ने 2008 में उनसे समय विस्तार शुल्क (Extension Fee) के रूप में ₹35,93,964 स्वीकार किए थे, इसलिए अब वे लीज रद्द नहीं कर सकते। अंत में, कंपनी ने इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी के तहत राहत मांगते हुए छह महीने में उत्पादन शुरू करने का प्रस्ताव दिया।

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प्रतिवादी (UPSIDA) की दलीलें: UPSIDA की ओर से सीनियर एडवोकेट आत्माराम एन.एस. नाडकर्णी ने दलील दी कि कंपनी ने 2002 से ही लीज की शर्तों का उल्लंघन किया है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि प्लॉट पर केवल 7.68% निर्माण मौजूद था, जो 1985 के मूल आवंटनकर्ता ने किया था। अपीलकर्ता ने कब्जा मिलने के बाद वहां “एक ईंट भी नहीं जोड़ी”। प्राधिकरण ने यह भी जोर दिया कि अपीलकर्ता ने एक निर्धारित प्रारूप में अनिवार्य शपथ पत्र जमा नहीं किया, जो उन्हें नौ महीने के भीतर उत्पादन शुरू करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य करता।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने औद्योगिक गलियारों (Industrial Corridors) के उद्देश्यों का विश्लेषण करते हुए कहा कि इनका लक्ष्य राजस्व और रोजगार पैदा करना होता है।

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लीज शर्तों के उल्लंघन पर: कोर्ट ने पाया कि कई वर्षों तक कब्जा रहने के बावजूद अपीलकर्ता ने लेआउट प्लान तक स्वीकृत नहीं कराया था। बेंच ने टिप्पणी की:

“अपीलकर्ता कंपनी, जो कि एक सुस्थापित कॉर्पोरेट इकाई है, उसे अज्ञानता के पर्दे के पीछे छिपने की अनुमति नहीं दी जा सकती… कंपनी विवादित प्लॉट पर पूर्ण पैमाने पर औद्योगिक विनिर्माण इकाई स्थापित करने के लिए कोई ठोस प्रयास या नेक नियत (bona fide intent) प्रदर्शित करने में विफल रही है।”

शपथ पत्र में “सोची-समझी” चूक पर: कोर्ट ने अपीलकर्ता द्वारा निर्धारित प्रारूप में शपथ पत्र न देने को गंभीर माना। बेंच ने कहा कि कंपनी ने जानबूझकर उन शर्तों को हटा दिया था जो उन्हें समय पर उत्पादन शुरू करने के लिए बाध्य करती थीं।

“यह चूक सोची-समझी और जानबूझकर की गई थी, क्योंकि निर्धारित प्रारूप में शपथ पत्र देने से अपीलकर्ता कंपनी कानूनी रूप से उन शर्तों से बंध जाती… कंपनी को स्पष्ट रूप से पता था कि नौ महीने की अवधि के भीतर उत्पादन शुरू नहीं किया जा सकता।”

न्यायसंगत राहत पर: कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत राहत देने से इनकार करते हुए कहा:

“ऐसे मुकदमेबाजों के पक्ष में न्याय नहीं हो सकता जिनका आचरण लापरवाह है और जो लागू नियमों और विनियमों का स्पष्ट उल्लंघन करते हैं।”

इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी पर कोर्ट ने कहा कि वह ऐसे वाणिज्यिक निर्णयों में राज्य सरकार के विवेक के स्थान पर अपना निर्णय थोपना उचित नहीं समझता।

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. अपीलकर्ता कंपनी को आज से तीस दिनों के भीतर प्लॉट का खाली और शांतिपूर्ण कब्जा UPSIDA को सौंपना होगा।
  2. UPSIDA कानून के अनुसार उस प्लॉट का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र होगा।
  3. अपील के दौरान कंपनी द्वारा कोर्ट रजिस्ट्री में जमा किए गए ₹10,95,52,825 की राशि ब्याज सहित कंपनी को वापस कर दी जाएगी।
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मामले का विवरण:

  • केस का शीर्षक: M/s. Piaggio Vehicles Pvt. Ltd. v. State of U.P. & Ors.
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 1944/2011
  • बेंच: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
  • दिनांक: 06 अप्रैल, 2026

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