मुकदमे की संपत्ति के मालिकाना हक को प्रभावित करने वाली डिक्री की बाद में जानकारी मिलना ‘ड्यू डिलिजेंस’ के दायरे में: सुप्रीम कोर्ट ने सीपीसी के ऑर्डर VI रूल 17 के तहत वादपत्र में देरी से संशोधन की दी अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुकदमे की संपत्ति के मालिकाना हक पर सीधा असर डालने वाली किसी सुलह डिक्री (कॉम्प्रोमाइज डिक्री) की बाद में जानकारी मिलना, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) के ऑर्डर VI रूल 17 के परंतुक (प्रोवाइज़ो) के तहत ‘ड्यू डिलिजेंस’ (उचित सावधानी या तत्परता) की शर्त को पूरा करता है। ऐसे में ट्रायल शुरू होने के बाद भी वादपत्र (प्लेन्ट) में संशोधन की अनुमति दी जा सकती है। सीनियर सिविल जज, कटक और उड़ीसा हाईकोर्ट के समवर्ती आदेशों को रद्द करते हुए जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने माना कि कानूनी और तथ्यात्मक सवालों का दायरा बढ़ जाना अपने आप में मुकदमे के मूल स्वरूप को बदलना नहीं माना जा सकता, और लिमिटेशन (मियाद) या कानूनी रोक से जुड़े विचारणीय सवालों को शुरुआती स्तर पर ही खारिज नहीं किया जाना चाहिए। पीठ की ओर से फैसला सुनाते हुए जस्टिस आर. महादेवन ने 25,000 रुपये के हर्जाने (कॉस्ट) पर संशोधन की अनुमति दे दी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद टाइटल सूट संख्या 86/2009 से जुड़ा है, जिसे मूल वादी रबींद्रनाथ साहू ने दायर किया था। उन्होंने वाद संपत्ति पर अपने अधिकार, मालिकाना हक और हित की घोषणा, कब्जे की बहाली, और 15 फरवरी 1971 तथा 28 जुलाई 1978 के पंजीकृत बैनामों (सेल डीड्स) में सुधार की मांग की थी। यह विवाद 1986 में प्रकाशित हाल खाता संख्या 198 के कुल 0.16 एकड़ में से 0.12 एकड़ जमीन को लेकर था, जिसमें हाल प्लॉट संख्या 3370/4045 (0.10 एकड़) और हाल प्लॉट संख्या 3371/4050 (0.02 एकड़) शामिल थे।

अपीलकर्ताओं के अनुसार, प्लॉट संख्या 3370/4045 को लेकर विभिन्न प्रतिवादियों के बीच वर्ष 2015 तक कई बार बैनामे निष्पादित किए गए। वहीं प्लॉट संख्या 3371/4050 को लेकर प्रतिवादी संख्या 8 ने वर्ष 2007 में प्रतिवादी संख्या 9 और 10 के पक्ष में बैनामा किया, हालांकि उस समय वादी को प्रतिवादी संख्या 8 के मालिकाना हक के स्रोत की जानकारी नहीं थी।

जब प्रतिवादी संख्या 9 और 10 ने अपने लिखित बयान (रिटन स्टेटमेंट) में यह बताया कि यह प्लॉट उनके नाम पर दर्ज है, तो वादी ने वादपत्र में संशोधन कर 1940 के एक आपसी बंटवारे के आधार पर अपने विशेष मालिकाना हक का दावा किया। इसके बाद वादी ने सीपीसी के ऑर्डर VI रूल 17 सहपठित धारा 151 के तहत एक और अर्जी दाखिल की। इसमें कहा गया कि प्रतिवादियों ने अपने बयान में म्यूटेशन केस नंबर का खुलासा नहीं किया था। इसके चलते जब वादी ने नियाली के तहसीलदार कार्यालय में पड़ताल की, तब उसे टाइटल सूट संख्या 105/1998 में पारित एक सुलह डिक्री का पता चला, जिसमें वह पक्षकार नहीं था। इस डिक्री के जरिए प्लॉट संख्या 3371/4050 की विवादित 0.02 एकड़ जमीन सहित कुल 0.04 एकड़ जमीन प्रतिवादी संख्या 8 को आवंटित की गई थी।

वादी ने टी.एस. संख्या 105/1998 से जुड़े बुनियादी तथ्यों को वादपत्र में जोड़ने और उस डिक्री को शून्य एवं अमान्य घोषित करने की मांग की। आवेदन लंबित रहने के दौरान मूल वादी का निधन हो गया, जिसके बाद उनके कानूनी वारिसों ने इस अर्जी को आगे बढ़ाया। ट्रायल कोर्ट ने 21 सितंबर 2022 को इस संशोधन अर्जी को खारिज कर दिया, और उड़ीसा हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल 2023 को इस फैसले की पुष्टि कर दी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि यह विवाद 1940 से चले आ रहे कई लेन-देन और विभिन्न दावेदारों के अधिकारों से जुड़ा एक बेहद जटिल मामला है। उन्होंने बताया कि नियाली के तहसीलदार ने भी 31 अगस्त 2007 के अपने एक आदेश में यह दर्ज किया था कि एक ही संपत्ति पर कई बैनामों और अलग-अलग राजस्व रिकॉर्ड सुधारों के कारण भारी भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। अपीलकर्ताओं ने कहा कि उन्हें इस सुलहनामे के वादपत्र और अंतिम डिक्री की सर्टिफाइड कॉपियां 22 जून 2020 को ही मिल सकीं, जो दर्शाता है कि उनकी ओर से उचित तत्परता बरती गई थी। ए.के. गुप्ता एंड संस लिमिटेड बनाम दामोदर वैली कॉरपोरेशन और अब्दुल रहमान व अन्य बनाम मोहम्मद रुल्दू व अन्य के फैसलों का हवाला देते हुए अपीलकर्ताओं ने कहा कि यह संशोधन कोई नया कॉज ऑफ एक्शन पेश नहीं करता और न ही मुकदमे की मूल प्रकृति को बदलता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि लिमिटेशन के बिंदु का फैसला मामले के तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि प्रारंभिक स्तर पर ही अर्जी खारिज करके।

दूसरी तरफ, प्रतिवादी संख्या 1 और 9 से 11 के वकील ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि वादी पक्ष बार-बार संशोधन अर्जियां दाखिल करके पिछले 14 वर्षों से मुकदमे को खींच रहा है, जिसकी शुरुआत 2007 में स्थायी निषेधाज्ञा (परमानेंट इंजंक्शन) के मुकदमे से हुई थी। प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि ट्रायल शुरू होने के काफी बाद यह संशोधन मांगा गया है, जो सीपीसी के ऑर्डर VI रूल 17 के परंतुक का उल्लंघन करते हुए मुकदमे के मूल स्वरूप को पूरी तरह बदल देगा। इसके समर्थन में उन्होंने बसवराज बनाम इंदिरा व अन्य के फैसले का हवाला दिया।

प्रतिवादियों ने यह भी कहा कि अर्जी में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि पड़ताल कब की गई और यह मुद्दा पहले क्यों नहीं उठाया गया। इसके अलावा, उन्होंने दलील दी कि यह चुनौती सीधे तौर पर मियाद से बाधित (बार्ड बाय लिमिटेशन) है और सीपीसी के ऑर्डर XXIII रूल 3A के तहत प्रतिबंधित है, जो किसी सुलह डिक्री को अलग मुकदमे के जरिए चुनौती देने पर रोक लगाता है।

कोर्ट का विश्लेषण और पूर्व नजीरें

सुप्रीम कोर्ट ने सीपीसी के ऑर्डर VI रूल 17 और उसके परंतुक के दायरे पर विचार करते हुए कहा कि हालांकि ट्रायल शुरू होने के बाद संशोधन की अनुमति ‘ड्यू डिलिजेंस’ साबित करने पर ही दी जा सकती है, लेकिन इस प्रावधान का मुख्य उद्देश्य पक्षों के बीच वास्तविक विवाद का प्रभावी और पूर्ण निपटारा करना है।

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स्थापित नजीरों का विश्लेषण करते हुए पीठ ने राजेश कुमार अग्रवाल व अन्य बनाम के.के. मोदी व अन्य के मामले का उल्लेख किया और कहा कि ‘वास्तविक विवाद का परीक्षण’ (रियल कंट्रोवर्सी टेस्ट) सबसे बुनियादी नियम है। कोर्ट ने अब्दुल रहमान बनाम मोहम्मद रुल्दू व अन्य के फैसले का उद्धरण देते हुए दोहराया:

“हम दोहराते हैं कि वे सभी संशोधन जो पक्षों के बीच वास्तविक विवादित प्रश्नों के निर्धारण के लिए आवश्यक हैं, स्वीकृत किए जाने चाहिए यदि वे मुकदमे के मूल स्वरूप को नहीं बदलते हैं। मांगी गई राहत के स्वरूप में बदलाव को मुकदमे के स्वरूप में बदलाव नहीं माना जाएगा और संशोधन की शक्ति का प्रयोग पक्षों के बीच पूर्ण एवं संपूर्ण न्याय करने के व्यापक हित में किया जाना चाहिए।”

अदालत ने रेवाजीतू बिल्डर्स एंड डेवलपर्स बनाम नारायणस्वामी एंड संस व अन्य में तय किए गए मार्गदर्शक सिद्धांतों, लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया बनाम संजीव बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड व अन्य के दिशा-निर्देशों, और अक्किराजू पांडुरंगा राव व अन्य बनाम गुंलापल्ली रंगा राव के हालिया फैसले का भी संदर्भ लिया, जिनमें अदालतों को अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण से बचने की हिदायत दी गई थी।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पीठ ने माना कि अपीलकर्ताओं ने ऑर्डर VI रूल 17 के परंतुक के तहत ड्यू डिलिजेंस की आवश्यकता को पूरा किया है:

“सुलह की कार्यवाहियों की बाद में जानकारी मिलना, साथ ही यह दावा कि मूल वादी उन कार्यवाहियों में पक्षकार नहीं था और लिखित बयान में विक्रेताओं के मालिकाना हक के स्रोत का खुलासा नहीं किया गया था, सीपीसी के ऑर्डर VI रूल 17 के परंतुक के प्रयोजनों के लिए उचित सावधानी (ड्यू डिलिजेंस) की दलील को स्वीकार करने का पर्याप्त आधार प्रदान करता है।”

यह संशोधन मुकदमे की प्रकृति को बदलता है या नहीं, इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की:

“प्रस्तावित संशोधन से उन तथ्यात्मक और कानूनी प्रश्नों का विस्तार हो सकता है जिन पर निर्णय की आवश्यकता है; हालांकि, ऐसे विस्तार को अपने आप में मुकदमे की प्रकृति और स्वरूप में मौलिक बदलाव के बराबर नहीं माना जा सकता।”

“वास्तविक जांच यह है कि क्या संशोधन एक ऐसा भिन्न और स्वतंत्र विवाद पेश करता है जिसका मूल कॉज ऑफ एक्शन से कोई संबंध नहीं है, या यह केवल अतिरिक्त तथ्यों और आनुषंगिक राहतों को रिकॉर्ड पर लाता है जिनका मौजूदा विवाद से सीधा संबंध है।”

लिमिटेशन की आपत्ति पर पीठ ने रघु तिलक डी. जॉन बनाम एस. रायप्पन व अन्य, संपत कुमार बनाम अय्याकन्नू व अन्य, और पंकज व अन्य बनाम येल्लप्पा (मृत) विधिक प्रतिनिधि व अन्य के निर्णयों का हवाला दिया। पीठ ने कहा कि जहां जानकारी की तिथि विवादित हो और लिमिटेशन का सवाल विचारणीय हो, वहां संशोधन को प्रारंभिक स्तर पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए।

इसी प्रकार, कोर्ट ने सीपीसी के ऑर्डर XXIII रूल 3A के तहत कानूनी रोक के बिंदु पर भी इस शुरुआती चरण में कोई अंतिम राय व्यक्त करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वादी के उस सुलह डिक्री में पक्षकार न होने के क्या कानूनी परिणाम होंगे, यह ऐसा विषय है जिसे दोनों पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद ट्रायल कोर्ट द्वारा तय किया जाना ही उचित है। अदालत ने यह भी माना कि संशोधन से इनकार करने से मालिकाना हक का विवाद टुकड़ों में बंट जाएगा और परस्पर विरोधी निष्कर्ष आने का जोखिम रहेगा, जबकि प्रतिवादियों को होने वाले किसी भी नुकसान की भरपाई अतिरिक्त लिखित बयान की अनुमति देकर और हर्जाना लगाकर की जा सकती है।

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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के 21 सितंबर 2022 के आदेश और हाईकोर्ट के 10 अप्रैल 2023 के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने वादी पक्ष को दो सप्ताह के भीतर प्रतिवादियों को 25,000 रुपये हर्जाना देने की शर्त पर संशोधन की अर्जी स्वीकार कर ली।

अपीलकर्ताओं को इसके चार सप्ताह के भीतर वादपत्र में परिणामी संशोधन करने का निर्देश दिया गया, साथ ही प्रतिवादियों को अपना अतिरिक्त लिखित बयान दर्ज करने की छूट दी गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संशोधन की अनुमति देने का अर्थ दावों के गुण-दोष को स्वीकार करना नहीं है। लिमिटेशन, मुकदमे की पोषणीयता, सीपीसी के ऑर्डर XXIII रूल 3A के प्रभाव, सुलह डिक्री की वैधता और मालिकाना हक से जुड़े सभी प्रश्न ट्रायल कोर्ट के समक्ष विचार के लिए खुले रखे गए हैं।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: हरमणि साहू और अन्य बनाम ललिता नायक और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 13681/2026
पीठ: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन
निर्णय की तिथि: 12 अक्टूबर 2026

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