12 फरवरी 2026 के फैसले के आधार पर हर मामले में बकाये के साथ दिव्यांगता पेंशन का दावा नहीं किया जा सकता; हर दावे का फैसला मेरिट पर होगा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पूर्व सैनिकों को ब्रॉड-बैंडिंग लाभ और दिव्यांगता पेंशन (डिसेबिलिटी पेंशन) के बकाये का भुगतान करने संबंधी उसका 12 फरवरी 2026 का साझा फैसला यह अधिकार नहीं देता कि हर मामले में बकाये के साथ दिव्यांगता पेंशन का दावा किया जा सके। जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि प्रत्येक दावे का निपटारा उसके अपने गुण-दोष (मेरिट) के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह स्पष्टीकरण केंद्र सरकार (यूनियन ऑफ इंडिया) द्वारा दायर एक विविध आवेदन (मिसलेनियस एप्लिकेशन) पर आया है। केंद्र ने सिविल अपील संख्या 6820-6824/2018 (यूनियन ऑफ इंडिया बनाम सार्जेंट गिरीश कुमार व अन्य) में 12 फरवरी 2026 को दिए गए साझा फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा था। उस साझा फैसले में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज करते हुए पूर्व सैनिकों की अपीलों को स्वीकार कर लिया था। अदालत ने पूर्व सैनिकों को 1 जनवरी 1996 या 1 जनवरी 2006 से, जैसी भी स्थिति हो, 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ ब्रॉड-बैंडिंग सहित दिव्यांगता पेंशन का हकदार माना था। इसके अलावा, अदालत ने परिसीमा (लिमिटेशन) और देरी के आधार पर केंद्र सरकार द्वारा उठाई गई आपत्तियों को भी अस्वीकार कर दिया था।

पक्षों की दलीलें

केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) अर्चना पाठक दवे ने दलील दी कि साझा फैसले द्वारा तय किए गए अपीलों के समूह में पूर्व सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन की मूल पात्रता कभी विवादित नहीं थी। उन्होंने कहा कि उस समूह के पूर्व सैनिक पहले से ही दिव्यांगता पेंशन प्राप्त कर रहे थे और वे केवल ब्रॉड-बैंडिंग के जरिए उसकी पुनर्गणना (री-कंप्यूटेशन) की मांग कर रहे थे। उन्होंने रेखांकित किया कि वह फैसला उन अपीलों के विशिष्ट तथ्यात्मक संदर्भ में सुनाया गया था और उसका उद्देश्य पुराने या अत्यधिक विलंबित पेंशन दावों से जुड़े कानूनी सिद्धांतों को बदलना नहीं था।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने वायुसेना से जुड़े 23 और थलसेना से जुड़े 26 ऐसे मामलों का ब्योरा पेश किया, जो साझा फैसले के बाद हाईकोर्ट या सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) के समक्ष तय हो चुके हैं या लंबित हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि कई मामलों में पहले पारित अंतिम आदेशों को—जिनमें बकाये के लाभ को सीमित किया गया था और जिनका केंद्र सरकार पहले ही पालन कर चुकी थी—इस साझा फैसले के आधार पर संशोधित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस फैसले का हवाला उन पूर्व सैनिकों के मामलों में भी दिया जा रहा है जो उस श्रेणी में नहीं आते। उन्होंने आगाह किया कि साझा फैसले को यांत्रिक रूप से लागू करने से गंभीर प्रशासनिक और वित्तीय प्रभाव पड़ेंगे और वे मामले फिर से खुल जाएंगे जो अंतिम रूप प्राप्त कर चुके हैं। इसलिए, उन्होंने अनुरोध किया कि यह स्पष्ट किया जाए कि साझा फैसले को उन सभी मामलों में आंख मूंदकर लागू न किया जाए जहां पेंशन की पात्रता ही विवादित थी और जिसे बाद में अदालतों या न्यायाधिकरणों द्वारा तय किया गया।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों के वकील एम.वी.आर. मुकुंदा ने निष्पक्षता से स्वीकार किया कि साझा फैसले में निर्दिष्ट तिथियों से बकाया केवल उन्हीं पूर्व सैनिकों को दिया गया था जो पहले से दिव्यांगता पेंशन पा रहे थे और केवल पुनर्गणना की मांग कर रहे थे। हालांकि, उन्होंने दलील दी कि देरी के सवाल को केंद्र सरकार के आचरण से अलग रखकर नहीं देखा जा सकता। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा तय एक मामले का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि 31 अक्टूबर 2011 को सेवानिवृत्त हुए एक पूर्व सैनिक ने 30 नवंबर 2011 को दिव्यांगता पेंशन के लिए अपील दायर की थी। उस अपील का फैसला 11 फरवरी 2017 को यानी छह साल बाद आया, इसलिए 30 अप्रैल 2018 को न्यायाधिकरण के समक्ष दायर मूल आवेदन पूरी तरह समय सीमा के भीतर था। उन्होंने यह भी कहा कि स्वयं आवेदक पक्ष ने अदालत का दरवाजा देर से खटखटाया है, इसलिए वह देरी के आधार पर राहत का दावा नहीं कर सकता।

READ ALSO  जस्टिस धीरज सिंह ठाकुर ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली

अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां

दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट ऑफ उड़ीसा बनाम सुधांशु शेखर मिश्रा व अन्य तथा स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश व अन्य बनाम मोहम्मद अरशद खान व अन्य के निर्णयों का उल्लेख करते हुए न्यायिक मिसालों (प्रेसीडेंट) से जुड़े स्थापित सिद्धांत को दोहराया:

“कानून में यह भली-भांति स्थापित है कि किसी निर्णय में की गई टिप्पणियों को किसी कानून के प्रावधानों की तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए, न ही उन्हें उन तथ्यों के संदर्भ से अलग करके पढ़ा जाना चाहिए जिनमें वे की गई थीं। तथ्यों में अंतर किसी निर्णय के नज़ीरी मूल्य (प्रेसीडेंशियल वैल्यू) में महत्वपूर्ण अंतर ला सकता है।”

इस कानूनी सिद्धांत को लागू करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया:

“उपर्युक्त स्थापित कानूनी सिद्धांतों के आलोक में, हम केवल इतना कहना चाहते हैं कि सिविल अपील संख्या 6820-6824/2018 में पारित 12.02.2026 के साझा फैसले का यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि उक्त फैसले के आधार पर हर मामले में बकाये के साथ दिव्यांगता पेंशन दिए जाने का दावा किया जा सकता है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि प्रत्येक दावे का निर्णय उसके अपने गुण-दोष (मेरिट) के आधार पर किया जाएगा।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने देरी को माफ करते हुए विविध आवेदन का निस्तारण कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि 12 फरवरी 2026 के साझा फैसले को सभी मामलों में बकाये सहित दिव्यांगता पेंशन का दावा करने के लिए एक सामान्य या सार्वभौमिक मिसाल नहीं माना जा सकता, और हर व्यक्ति के दावे का निपटारा उसके अपने तथ्यों और मेरिट के आधार पर ही किया जाएगा।

मामले का विवरण

READ ALSO  [आदेश VII नियम 11 सीपीसी] यदि दावा की गई एक भी राहत सुनवाई योग्य है तो वादपत्र खारिज नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

मामले का शीर्षक: यूनियन ऑफ इंडिया थ्रू इट्स सेक्रेटरी व अन्य बनाम सार्जेंट गिरीश कुमार व अन्य

वाद संख्या: डायरी संख्या 43523/2026 सिविल अपील संख्या 6820/2018 

पीठ: जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे

निर्णय की तिथि: 12 अक्टूबर 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles