जेलों में भीड़ कम करने के लिए ओपन जेलों के विस्तार और समान शासन व्यवस्था पर सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने देश की जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों की समस्या से निपटने के लिए ‘ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशंस’ (OCI) यानी ओपन जेलों के विस्तार और उनके बेहतर उपयोग को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत गरिमा की संवैधानिक गारंटी जेल के फाटकों के अंदर भी लागू होती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दंड का उद्देश्य केवल बदला लेना नहीं बल्कि सुधार होना चाहिए।

अदालत ने जस्टिस (रिटायर्ड) एस. रविंद्र भट की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय समिति (High-Powered Committee) का गठन किया है, जो सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ओपन जेलों के प्रबंधन के लिए ‘कॉमन मिनिमम स्टैंडर्ड्स’ (न्यूनतम साझा मानक) तैयार करेगी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सुहास चाकमा द्वारा अनुच्छेद 32 के तहत दायर एक रिट याचिका से उत्पन्न हुआ था, जिसमें देशभर की जेलों में कैदियों की भारी भीड़ की ओर ध्यान आकर्षित किया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि कई राज्यों में कैदियों की संख्या स्वीकृत क्षमता से 150% से भी अधिक है, जिसके कारण जेलों में अमानवीय और अपमानजनक स्थिति पैदा हो गई है।

सुनवाई के दौरान, अदालत ने ओपन जेलों को जेलों की भीड़ कम करने के लिए एक “मानवीय और टिकाऊ समाधान” के रूप में देखा। पीठ ने खेद जताया कि In Re: Inhuman Conditions in 1382 Prisons (2018) में दिए गए पिछले निर्देशों के बावजूद, राज्यों ने ओपन जेलों के लिए मॉडल नियमों को अपनाने में “घोर उदासीनता” दिखाई है।

पक्षों की दलीलें

भारत सरकार ने 9 जुलाई, 2024 के अपने हलफनामे में कहा कि उसने ‘मॉडल जेल मैनुअल, 2016’ और ‘मॉडल जेल एवं सुधारात्मक सेवा अधिनियम, 2023’ जारी कर दिए हैं। हालांकि, संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत “जेल और उसमें बंद व्यक्ति” राज्य का विषय होने के कारण, इसे लागू करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्यों की है।

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एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) श्री के. परमेश्वर ने डेटा प्रस्तुत करते हुए बताया कि ओपन जेलों का उपयोग उनकी क्षमता से बहुत कम किया जा रहा है। उन्होंने राजस्थान का उदाहरण देते हुए बताया कि जहां एक बंद जेल में प्रति कैदी मासिक खर्च ₹7,094 है, वहीं ओपन जेल में यह केवल ₹500 है। उन्होंने ओपन जेलों में महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंधों और कड़े पात्रता मानदंडों की ओर भी इशारा किया।

अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय मानकों, विशेष रूप से ‘नेल्सन मंडेला नियमों’ के आलोक में मामले का विश्लेषण किया।

1. कम उपयोग और वित्तीय मितव्ययिता

अदालत ने पाया कि एक तरफ दिल्ली (207%) और उत्तराखंड (183%) जैसी जगहों पर जेलों में भारी भीड़ है, वहीं दूसरी तरफ ओपन जेलों की सीटें खाली पड़ी हैं।

नेल्सन मंडेला के शब्दों को उद्धृत करते हुए कोर्ट ने कहा, “किसी राष्ट्र को तब तक सही मायने में नहीं जाना जा सकता जब तक कि कोई उसकी जेलों के अंदर न गया हो। किसी राष्ट्र का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि वह अपने उच्चतम नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है, बल्कि इस आधार पर कि वह अपने निम्नतम नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है।”

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राजस्थान के आंकड़ों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि ओपन जेलें न केवल सुधारात्मक हैं बल्कि वित्तीय रूप से भी तर्कसंगत हैं। बंद जेलें, ओपन जेलों की तुलना में लगभग 78 गुना अधिक महंगी पाई गईं।

2. लैंगिक भेदभाव और महिलाओं का बहिष्कार

अदालत ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि असम, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों में महिलाओं को ओपन जेलों के लिए पात्र नहीं माना जाता है।

पीठ ने कहा, “महिलाओं को ओपन जेलों से बाहर रखना… सीधे तौर पर लैंगिक भेदभाव है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 15(1) का उल्लंघन है। यह अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीने के उनके अधिकार का भी हनन करता है।”

3. दंडात्मक दर्शन में बदलाव

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि कारावास से सुधार का अवसर समाप्त नहीं होना चाहिए। रामा मूर्ति बनाम कर्नाटक राज्य (1997) का जिक्र करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि ओपन जेलें सजा के “व्यक्तिगतकरण” (individualization) के सिद्धांत का सबसे सफल उदाहरण हैं।

अदालत के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्यों को कई बाध्यकारी निर्देश जारी किए हैं:

  • उच्च-स्तरीय समिति का गठन: जस्टिस एस. रविंद्र भट (रिटायर्ड) की अध्यक्षता में एक समिति छह महीने के भीतर ‘न्यूनतम साझा मानक’ तैयार करेगी। इसमें नालसा (NALSA) और बीपीआरएंडडी (BPR&D) के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
  • अनिवार्य उपयोग: जिन राज्यों में ओपन जेलें हैं, उन्हें तीन महीने के भीतर रिक्त पदों को भरने के लिए एक समयबद्ध प्रोटोकॉल विकसित करना होगा।
  • महिलाओं के लिए विस्तार: सभी राज्यों को महिलाओं को बाहर रखने वाले नियमों की समीक्षा करनी होगी और उनके लिए समर्पित ओपन जेल सुविधाएं या ओपन बैरक बनाने होंगे। कोर्ट ने आदेश दिया कि “सुरक्षा संबंधी चिंताओं को महिलाओं को इन सुविधाओं से वंचित करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।”
  • नए राज्यों में स्थापना: जिन राज्यों में ओपन जेलें नहीं हैं (जैसे तेलंगाना, हरियाणा, छत्तीसगढ़), उन्हें इनकी स्थापना की संभावनाओं का आकलन करना होगा।
  • निगरानी तंत्र: प्रत्येक हाईकोर्ट को इस फैसले के पालन की निगरानी के लिए एक ‘सुओ मोटो’ रिट याचिका दर्ज करने का निर्देश दिया गया है। इसके अलावा, राज्य स्तर पर निगरानी समितियों का गठन किया जाएगा।
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अदालत ने अंत में दोहराया कि “जेल जाने मात्र से कैदियों के संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते।” इस मामले की अगली सुनवाई 1 सितंबर, 2026 को होगी।

केस का शीर्षक: सुहास चाकमा बनाम भारत संघ और अन्य

रिट याचिका (सिविल) संख्या: 1082/2020

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