दारा सिंह की समय पूर्व रिहाई याचिका पर फैसला न लेने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ओडिशा सरकार से कहा- निर्णय लें वरना हम आदेश देंगे

ऑस्ट्रेलियन मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे रवींद्र पाल उर्फ दारा सिंह की समय पूर्व रिहाई की अर्जी पर फैसला टालने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने राज्य सरकार से स्पष्ट कहा कि वह इस मामले में जल्द निर्णय ले, अन्यथा अदालत खुद इस पर अपना आदेश जारी करेगी।

टालमटोल की नीति पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी

शीर्ष अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 2 सितंबर तय करते हुए स्टेट सेंटेंस Review बोर्ड को इस अवधि में अंतिम फैसला लेकर कोर्ट को सूचित करने का निर्देश दिया। पीठ ने इस बात पर गहरा असंतोष जताया कि जुलाई में बोर्ड को एक महीने का समय दिए जाने के बावजूद कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने क्यॉन्झर जिला जेल से रिपोर्ट न मिलने का पत्र पेश किया, जिस पर पीठ ने कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि जेल की रिपोर्ट का हवाला देकर निर्णय लेने से बचा नहीं जा सकता, क्योंकि समय पूर्व रिहाई पर अंतिम फैसला सेंटेंस Review बोर्ड को ही लेना है।

24 साल से अधिक सजा काटने और पश्चाताप का हवाला

वर्तमान में 63 वर्षीय दारा सिंह ने 2024 में सुप्रीम कोर्ट का रुख कर समय पूर्व रिहाई की मांग की थी। दारा सिंह पिछले 26 वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद है और बिना किसी छूट के 24 साल से अधिक की वास्तविक सजा काट चुका है। याचिका में उसने ओडिशा सरकार की अप्रैल 2022 की समय पूर्व रिहाई नीति का हवाला दिया, जिसके तहत न्यूनतम 14 साल की सजा पूरी करने वाले कैदियों के आवेदन पर विचार किया जाता है। दारा सिंह ने अदालत में कहा कि उसने यह अपराध अपनी युवावस्था के आवेश में किया था, जिसका उसे गहरा पश्चाताप है। उसने समाज सेवा और आध्यात्मिक मार्ग के जरिए जीवन सुधारने का अवसर मांगा है। उसने यह भी तर्क दिया कि प्रशासनिक देरी के कारण संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकार का हनन हो रहा है।

1999 का भीषण हत्याकांड और कानूनी कार्रवाई

यह मामला 22-23 जनवरी 1999 की मध्य रात्रि का है, जब ओडिशा के क्यॉन्झर जिले के मनोहरपुर गांव में दारा सिंह के नेतृत्व में एक उग्र भीड़ ने ग्राहम स्टेन्स और उनके दो मासूम बेटों—11 वर्षीय फिलिप और 8 वर्षीय तिमोथी—की स्टेशन वैगन कार को घेरकर उसमें आग लगा दी थी। ग्राहम स्टेन्स अपनी पत्नी ग्लेडिस स्टेन्स के साथ मयूरभंज इवेंजेलिकल मिशनरी संगठन से जुड़कर कुष्ठ रोगियों की सेवा करते थे।

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मामले की जांच के बाद 2003 में सीबीआई की विशेष अदालत ने मुख्य आरोपी दारा सिंह को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। इसके बाद 2005 में उड़ीसा हाईकोर्ट ने फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया, जिसे 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा। इस केस में सह-आरोपी महेंद्र हेम्ब्रम भी उम्रकैद की सजा काट रहा है, जबकि साक्ष्यों के अभाव में 11 अन्य लोगों को हाईकोर्ट ने बरी कर दिया था। उल्लेखनीय है कि ग्लेडिस स्टेन्स, जिन्हें 2005 में समाज सेवा के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया था, ने इस अपराध के सभी दोषियों को सार्वजनिक रूप से क्षमा कर दिया था।

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