भर्ती नियमों में समकक्षता का प्रावधान न होने पर एनआईओएस से 10वीं पास को ’10+2 प्रणाली’ के समान नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि भर्ती नियमों में समकक्षता (इक्विवेलेंस) का कोई प्रावधान नहीं है, तो नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (एनआईओएस) से प्राप्त सेकेंडरी स्कूल सर्टिफिकेट को ’10+2 शिक्षा प्रणाली के तहत 10वीं पास’ की अनिवार्य योग्यता के बराबर नहीं माना जा सकता। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ के फैसले को रद्द करते हुए निर्णय दिया कि न्यायिक समीक्षा के दौरान अदालतें पात्रता शर्तों का दायरा नहीं बढ़ा सकतीं और न ही नियमों में अपनी ओर से समकक्षता जोड़ सकती हैं। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि लिखित परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करने से किसी अनिवार्य पात्रता शर्त की कमी पूरी नहीं हो सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद गोवा सरकार के कौशल विकास एवं उद्यमिता निदेशालय (प्रत्यर्थी संख्या 2) द्वारा 5 नवंबर 2021 को जारी भर्ती विज्ञापन से शुरू हुआ था। इस विज्ञापन के तहत प्लंबर ट्रेड में वोकेशनल इंस्ट्रक्टर (प्रैक्टिकल) सहित विभिन्न पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। यह भर्ती 20 अप्रैल 2006 को राजपत्र में अधिसूचित भर्ती नियमों के तहत संचालित थी, जिसमें निम्नलिखित अनिवार्य योग्यताएं निर्धारित थीं:

  • शैक्षणिक: 10+2 शिक्षा प्रणाली के तहत 10वीं कक्षा उत्तीर्ण;
  • तकनीकी: संबंधित ट्रेड में नेशनल ट्रेड सर्टिफिकेट या नेशनल अप्रेंटिसशिप सर्टिफिकेट;
  • अनुभव: उद्योग में कम से कम 5 वर्ष का व्यावहारिक अनुभव।

अपीलकर्ता संतोष बी. नाइक और प्रत्यर्थी संख्या 3 दोनों ने अनारक्षित श्रेणी के तहत आवेदन किया। 9 नवंबर 2022 को आयोजित लिखित परीक्षा में प्रत्यर्थी संख्या 3 को 96 अंक और अपीलकर्ता को 94 अंक मिले। 8 मार्च 2023 के नोटिस के बाद दस्तावेजों का सत्यापन हुआ और 23 मार्च 2023 को डिपार्टमेंटल सिलेक्शन कमेटी ने पात्रता की जांच की।

सत्यापन के दौरान सिलेक्शन कमेटी ने पाया कि प्रत्यर्थी संख्या 3 ने जून 2004 में एनआईओएस के माध्यम से सेकेंडरी स्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा पास की थी। उन्होंने अंग्रेजी, गृह विज्ञान, विज्ञान, अर्थशास्त्र और हिंदी विषय पढ़े थे, जबकि गणित विषय का अध्ययन नहीं किया था। इसके चलते कमेटी ने उन्हें 10+2 प्रणाली के तहत 10वीं पास न होने के कारण अपात्र घोषित कर दिया। वहीं, अपीलकर्ता को पात्र पाते हुए अंतिम चयन सूची में शामिल किया गया और 24 मार्च 2023 को नियुक्ति की पेशकश की गई, जिसे उन्होंने 27 मार्च 2023 को स्वीकार कर लिया।

अपात्र ठहराए जाने के खिलाफ प्रत्यर्थी संख्या 3 ने बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ में रिट याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने 11 जनवरी 2024 को याचिका स्वीकार करते हुए फैसला सुनाया कि एनआईओएस की सामान्य मान्यता को देखते हुए इसे निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने 23 मार्च 2023 के सिलेक्शन कमेटी के निर्णय और 12 अप्रैल 2023 के पत्र को रद्द करते हुए अधिकारियों को लिखित परीक्षा के अंकों के आधार पर प्रत्यर्थी संख्या 3 की नियुक्ति पर विचार करने का निर्देश दिया। इस आदेश को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से दलीलें

अपीलकर्ता के वकील शिवेन देसाई और साल्वाडोर संतोष रेबेलो ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने भर्ती नियमों में प्रयुक्त विशिष्ट शब्दावली “10+2 शिक्षा प्रणाली के तहत 10वीं उत्तीर्ण” पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने कहा कि इंजीनियरिंग ट्रेड से जुड़े इस तकनीकी पद के लिए यह शर्त सोच-समझकर रखी गई थी।

अपीलकर्ता के वकीलों ने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत 10+2 प्रणाली एक औपचारिक और संरचित स्कूली शिक्षा का ढांचा है जिसमें विज्ञान और गणित अनिवार्य विषय होते हैं, जबकि प्रत्यर्थी संख्या 3 ने एनआईओएस में गणित विषय पढ़ा ही नहीं था। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने नियमों में अनुपस्थित समकक्षता का प्रावधान खुद जोड़कर न्यायिक समीक्षा की सीमाओं का उल्लंघन किया। इसके अलावा, विभाग ने 2015 की पिछली भर्ती में भी इसी नियम का पालन करते हुए खुद अपीलकर्ता को ओपन स्कूलिंग सर्टिफिकेट होने के कारण अपात्र ठहराया था।

गोवा राज्य (प्रत्यर्थी 1 व 2) की ओर से दलीलें

गोवा सरकार और निदेशालय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शिरीन खजूरिया ने अपील का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि भर्ती प्रक्रिया वैधानिक नियमों के तहत संचालित हुई थी। “10+2 शिक्षा प्रणाली” एक औपचारिक स्कूली ढांचे (5 वर्ष प्राथमिक, 3 वर्ष माध्यमिक और 2 वर्ष हाई स्कूल) को दर्शाती है, जिसमें बुनियादी विषय शामिल होते हैं, जबकि ओपन स्कूलिंग मॉडल में यह बाध्यता नहीं होती। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब नियमों में कोई समकक्षता का प्रावधान नहीं है, तो सामान्य मान्यता के आधार पर नियोक्ता की निर्धारित विशिष्ट शर्त को शिथिल नहीं किया जा सकता।

प्रत्यर्थी संख्या 3 की ओर से दलीलें

अपील का विरोध करते हुए अधिवक्ता संग्रामसिंह आर. भोंसले ने तर्क दिया कि प्रत्यर्थी संख्या 3 ने लिखित परीक्षा में सर्वाधिक 96 अंक हासिल किए थे और उनके पास सभी आवश्यक तकनीकी प्रमाणपत्र थे। साथ ही, उन्होंने गवर्नमेंट आईटीआई, पेडने (पेरनेम) में प्लंबर ट्रेड के गेस्ट लेक्चरर के रूप में भी कार्य किया था। उन्होंने एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के 5 अक्टूबर 1993 के परिपत्र का हवाला देते हुए कहा कि रोजगार के उद्देश्य से एनआईओएस की 10वीं परीक्षा को मान्यता प्राप्त बोर्डों की 10वीं के समकक्ष माना गया है। उन्होंने कहा कि नियमों में ओपन स्कूलिंग को स्पष्ट रूप से वर्जित नहीं किया गया था, इसलिए हाईकोर्ट का आदेश सही था।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष

जस्टिस विपुल एम. पंचोली द्वारा लिखे गए फैसले में अदालत ने मुख्य प्रश्न यह तय किया कि क्या एनआईओएस से सेकेंडरी स्कूल सर्टिफिकेट धारक उम्मीदवार प्लंबर ट्रेड के वोकेशनल इंस्ट्रक्टर (प्रैक्टिकल) पद हेतु “10+2 शिक्षा प्रणाली के तहत 10वीं कक्षा उत्तीर्ण” की विशिष्ट शर्त को पूरा करता है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि नियमों में प्रयुक्त वैधानिक शब्दों की अनदेखी नहीं की जा सकती:

“यह स्थापित सिद्धांत है कि किसी विशेष पद के लिए भर्ती प्राधिकरण द्वारा निर्धारित योग्यताओं को उसी रूप में पूरा किया जाना चाहिए जिस रूप में वे निर्धारित की गई हैं। न्यायिक समीक्षा का प्रयोग करते हुए अदालतें आमतौर पर भर्ती नियमों में निर्धारित अनिवार्य योग्यताओं में न तो कुछ जोड़ सकती हैं और न ही बदलाव कर सकती हैं। किसी उम्मीदवार के पास मौजूद योग्यता निर्धारित योग्यता के समकक्ष है या नहीं, यह तय करना आमतौर पर नियोक्ता या सक्षम विशेषज्ञ निकाय का अधिकार क्षेत्र है।”

इस सिद्धांत को दोहराते हुए पीठ ने जहूर अहमद राथर बनाम शेख इम्तियाज अहमद (2019), उन्नीकृष्णन सी.वी. बनाम भारत संघ (2023), और शिफाना पी.एस. बनाम केरल राज्य (2024) जैसे फैसलों का उल्लेख किया, जिनमें माना गया है कि न्यायिक समीक्षा के जरिए पात्रता शर्तों का विस्तार नहीं किया जा सकता। अदालत ने महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग बनाम संदीप श्रीराम वराडे (2019) का भी हवाला दिया कि अनिवार्य योग्यता तय करना पूरी तरह नियोक्ता के अधिकार क्षेत्र में आता है।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया बनाम पीयरलेस जनरल फाइनेंस एंड इनवेस्टमेंट कंपनी लिमिटेड (1987) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि वैधानिक व्याख्या संदर्भ और पाठ दोनों पर आधारित होनी चाहिए:

“हमारे विचार से, ’10+2 शिक्षा प्रणाली के तहत’ शब्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वे पद के लिए निर्धारित योग्यता का अभिन्न हिस्सा हैं और उन्हें उनका उचित अर्थ दिया जाना चाहिए।”

अदालत ने सामान्य मान्यता और पद-विशिष्ट योग्यता के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा:

“इसलिए सवाल यह नहीं है कि एनआईओएस द्वारा जारी सेकेंडरी स्कूल सर्टिफिकेट सामान्य रूप से एक मान्यता प्राप्त योग्यता है या नहीं। मूल सवाल यह है कि क्या ऐसी योग्यता विचाराधीन पद के लिए भर्ती नियमों के तहत निर्धारित विशिष्ट पात्रता शर्त को पूरा करती है।”

बोर्डों द्वारा एनआईओएस को दी गई मान्यता पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा:

“ऐसी मान्यता उस योग्यता की स्वीकार्यता को केवल उसी उद्देश्य के लिए स्थापित कर सकती है जिसके लिए वह प्रदान की गई है। यह अपने आप में किसी विशेष पद पर नियुक्ति के लिए भर्ती नियमों के तहत निर्धारित पात्रता शर्त में संशोधन या उसका विस्तार नहीं कर सकती।”

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि नियोक्ता ने अपने नियमों की निरंतर और एकसमान व्याख्या की है, क्योंकि 2015 की भर्ती में खुद अपीलकर्ता को इसी आधार पर अपात्र माना गया था।

लिखित परीक्षा में अधिक अंक पाने के तर्क को खारिज करते हुए अदालत ने निर्णय दिया:

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“तुलनात्मक मेरिट पर विचार केवल उन्हीं उम्मीदवारों के बीच किया जा सकता है जो निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरा करते हैं। लिखित परीक्षा में प्राप्त अंक भर्ती नियमों के तहत निर्धारित अनिवार्य योग्यता की कमी को पूरा नहीं कर सकते।”

पीठ ने स्पष्ट किया कि यह निष्कर्ष केवल इस विशेष पद के भर्ती नियमों और 5 नवंबर 2021 के विज्ञापन तक ही सीमित है। अन्य प्रक्रियाओं या नियमों के तहत एनआईओएस की सामान्य मान्यता या समकक्षता पर कोई राय व्यक्त नहीं की गई है।

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर गंभीर त्रुटि की थी। अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ द्वारा रिट याचिका संख्या 272/2023 में 11 जनवरी 2024 को पारित आदेश को रद्द किया जाता है।
  2. हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में प्रत्यर्थी संख्या 3 को जारी 19 फरवरी 2024 के ज्ञापन और 11 जून 2024 के नियुक्ति आदेश को रद्द किया जाता है।
  3. डिपार्टमेंटल सिलेक्शन कमेटी का 23 मार्च 2023 का निर्णय, जिसमें प्रत्यर्थी संख्या 3 को अपात्र ठहराया गया था और अपीलकर्ता का चयन हुआ था, बहाल किया जाता है।
  4. अपीलकर्ता की मूल चयन के आधार पर 24 मार्च 2023 के ज्ञापन के तहत हुई अस्थायी नियुक्ति को सेवा शर्तों के अधीन बहाल किया जाता है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: संतोष बी. नाइक बनाम गोवा राज्य व अन्य 

वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 13460/2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 35916/2026, डायरी संख्या 11600/2025 से उद्भूत) 

पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली 

निर्णय की तिथि: 06 अक्टूबर, 2026

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