सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के पूर्व सदस्यों पर लगा वह प्रतिबंध हटाने से साफ इनकार कर दिया है, जो उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद इन्हीं मंचों पर वकालत या सलाह देने से रोकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने इस नियम को बरकरार रखते हुए कहा कि न्यायपालिका की निष्पक्षता और इसकी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए यह प्रतिबंध अत्यंत आवश्यक है।
विवाद की वजह: आजीवन प्रतिबंध बनाम कूलिंग-ऑफ पीरियड
यह मामला NCLAT के पूर्व तकनीकी सदस्य विजय प्रताप सिंह द्वारा दायर की गई एक याचिका से जुड़ा था। सिंह ने उस वैधानिक नियम को चुनौती दी थी, जिसके तहत पूर्व न्यायिक और तकनीकी सदस्यों के NCLT और NCLAT के समक्ष वकील या सलाहकार के रूप में उपस्थित होने, पैरवी करने या काम करने पर पूरी तरह से (आजीवन) रोक लगी हुई है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि पूरी जिंदगी के लिए यह प्रतिबंध लगाना अत्यधिक सख्त है। उन्होंने सुझाव दिया कि इस पूर्ण रोक की जगह नियमों में एक निश्चित समय के “कूलिंग-ऑफ पीरियड” (अस्थायी प्रतिबंध अवधि) का प्रावधान किया जाना चाहिए।
जनविश्वास और निष्पक्षता पर कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट की पीठ याचिकाकर्ता के इस तर्क से बिल्कुल भी सहमत नहीं दिखी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे पूर्व सदस्यों के कोर्ट रूम में दोबारा वकील के रूप में पेश होने से न्यायाधिकरणों की निष्पक्ष छवि प्रभावित हो सकती है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता को संबोधित करते हुए टिप्पणी की: “आपको न्यायपालिका की स्वतंत्रता के बारे में सोचना होगा। आप खुद इस न्यायाधिकरण के सदस्य रह चुके हैं। यह एक अति-विशिष्ट (सुपर स्पेशल) ट्रिब्यूनल है। जरा कल्पना कीजिए कि आप उसी सदस्य के सामने पैरवी के लिए खड़े हैं, जो आपके कार्यकाल के दौरान आपके साथ काम कर रहा था। ऐसे में वहां मौजूद एक आम वादी के मन में न्याय व्यवस्था को लेकर क्या धारणा बनेगी?”
न्यायालय ने आम लोगों के भरोसे को प्राथमिकता देते हुए स्पष्ट कर दिया कि किसी भी प्रकार के हितों के टकराव (conflict of interest) की आशंका को खत्म करने के लिए इस सीमा को बनाए रखना जरूरी है।
याचिका खारिज
शीर्ष अदालत के इस कड़े रुख और राहत देने की अनिच्छा को देखते हुए याचिकाकर्ता विजय प्रताप सिंह ने अपनी याचिका वापस लेने का निर्णय लिया। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने मामले को ‘वापस लेने के आधार पर खारिज’ (dismissed as withdrawn) कर दिया, जिससे सेवानिवृत्ति के बाद वकालत न करने का यह सख्त नियम यथावत लागू रहेगा।

