सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर हैं, तो उसे स्टैम्प ड्यूटी के उद्देश्य से ‘बॉन्ड’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने मैसर्स श्री लक्ष्मी बालाजी एंटरप्राइजेज द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें उक्त दस्तावेज को साक्ष्य (एविडेंस) के रूप में स्वीकार्य माना गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद मूल रूप से एक सिविल सूट से जुड़ा है, जो प्रतिवादी-वादी (मैसर्स अंगीठीस रेस्टोरेंट) द्वारा 69,61,547 रुपये की वसूली के लिए दायर किया गया था। मुकदमे की सुनवाई के दौरान, वादी पक्ष ने 1 अगस्त 2015 के एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) को साक्ष्य के तौर पर पेश करने और प्रदर्शित करने की अनुमति मांगी।
अपीलकर्ता-प्रतिवादी ने इस पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि उक्त दस्तावेज पर ‘बॉन्ड’ के अनुसार आवश्यक स्टैम्प ड्यूटी नहीं दी गई है, इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। ट्रायल कोर्ट ने इस आपत्ति को सही माना और दस्तावेज को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसके खिलाफ वादी पक्ष ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) दायर की। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए निर्णय दिया कि यह दस्तावेज ‘बॉन्ड’ नहीं बल्कि एक साधारण MoU है और इसे साक्ष्य में स्वीकार किया जा सकता है।
इसके बाद, अपीलकर्ताओं ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष ‘स्टेट ऑफ केरल और अन्य बनाम मैकडॉवेल एंड कंपनी लिमिटेड [1994 Supp (2) SCC 605]’ के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि किसी दस्तावेज की प्रकृति उसके शीर्षक से नहीं, बल्कि उसकी सामग्री से तय होती है।
अपीलकर्ताओं का कहना था कि चूंकि MoU में राशि के भुगतान का उल्लेख है, इसलिए इसे बॉन्ड माना जाना चाहिए और उस पर बॉन्ड के अनुसार उचित स्टैम्प ड्यूटी लगाई जानी चाहिए। चूंकि ऐसा नहीं किया गया, इसलिए दस्तावेज साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं है।
इसके विपरीत, प्रतिवादी (रेस्पोंडेंट) के वकील ने दलील दी कि यह MoU पार्टियों के बीच पहले निष्पादित एक लीज डीड के अतिरिक्त है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस MoU पर दोनों पक्षों ने हस्ताक्षर किए हैं और इसमें बॉन्ड के आवश्यक लक्षण मौजूद नहीं हैं।
कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन
दोनों पक्षों को सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट का दृष्टिकोण सही था। पीठ ने स्पष्ट किया कि विचाराधीन MoU को बॉन्ड नहीं माना जा सकता क्योंकि “इस पर दोनों पक्षों द्वारा हस्ताक्षर किए गए हैं, न कि केवल एक पक्ष द्वारा जो खुद को भुगतान के लिए बाध्य कर रहा हो और भुगतान को किसी शर्त के अधीन कर रहा हो।”
कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष की पुष्टि की कि दस्तावेज की सामग्री भारतीय स्टैम्प अधिनियम की धारा 2(5) के खंड (a) से (c) के तहत नहीं आती है। पीठ ने नोट किया कि पैसे के भुगतान का दायित्व किसी शर्त पर निर्भर नहीं है और दस्तावेज पर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर इसे एक समझौता (Agreement) बनाते हैं।
मैकडॉवेल एंड कंपनी लिमिटेड के मामले का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने कहा कि बॉन्ड वह दस्तावेज है जिसके द्वारा एक व्यक्ति खुद को दूसरे को राशि का भुगतान करने के लिए बाध्य करता है, इस शर्त पर कि यदि कोई विशिष्ट कार्य किया जाता है या नहीं किया जाता है तो वह दायित्व शून्य हो जाएगा। कोर्ट ने उस फैसले से प्रासंगिक सवाल उठाया:
“क्या दस्तावेज निष्पादित करने वाले ने खुद को किसी दायित्व के तहत रखा है, या खुद को दूसरे को राशि का भुगतान करने के लिए बाध्य किया है, और क्या वह दायित्व विशिष्ट परिस्थितियों में शून्य हो जाएगा? यदि निष्पादक पर केवल उस दस्तावेज के आधार पर उस राशि के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, तो वह दस्तावेज एक बॉन्ड है।”
वर्तमान मामले को मैकडॉवेल से अलग करते हुए, कोर्ट ने कहा:
“वर्तमान मामले में, केवल निष्पादक ने ही दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, बल्कि दोनों पक्षों ने हस्ताक्षर किए हैं। इसलिए, जबकि मैकडॉवेल एंड कंपनी लिमिटेड (सुप्रा) में निर्धारित कानून तय है, यह दोनों पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित दस्तावेजों की प्रकृति, सामग्री और विवरण को देखते हुए वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होता है।”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि विचाराधीन दस्तावेज बॉन्ड नहीं है। तदनुसार, अपील खारिज कर दी गई और MoU को साक्ष्य में स्वीकार करने के हाईकोर्ट के आदेश को यथावत रखा गया।
केस विवरण
- केस टाइटल: मैसर्स श्री लक्ष्मी बालाजी एंटरप्राइजेज और अन्य बनाम मैसर्स अंगीठीस रेस्टोरेंट और अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील (S.L.P. (Civil) No. 5070/2024 से उत्पन्न)
- कोरम: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले

