CrPC की धारा 82 के तहत भगोड़ा घोषित करना अग्रिम जमानत पर पूर्ण रोक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 82 के तहत किसी आरोपी को भगोड़ा घोषित कर देने से, उसके अग्रिम जमानत आवेदन पर विचार करने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लग जाता, खासकर जब आरोपी के पास गंभीर व्यक्तिगत परिस्थितियां हों।

न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की एकल पीठ ने एक नर्स मोनिका को अग्रिम जमानत प्रदान करते हुए यह कहा कि जब उसके विरुद्ध गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया गया, तब वह “गर्भवती अवस्था” में थीं और वारंट जारी होने के चार दिन पहले ही उन्होंने बच्चे को जन्म दिया था।

न्यायालय ने अपने आदेश में कहा:

“ऐसा नहीं है कि सभी मामलों में अग्रिम जमानत के आवेदन पर विचार करने पर पूर्ण प्रतिबंध होगा। वर्तमान मामले में, जब अभियुक्ता के विरुद्ध कुछ प्रक्रियाएं जारी की गई थीं, वह गर्भवती थीं और न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं हो सकीं। यह न्यायालय इस मामले को अग्रिम जमानत दिए जाने के योग्य पाता है।”

आवेदिका एक नर्स हैं और उनके खिलाफ IPC की धारा 316 (गर्भस्थ शिशु की मृत्यु कारित करना), धारा 420 (धोखाधड़ी), धारा 504 (शांति भंग के लिए अपमान), धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) तथा मेडिकल काउंसिल अधिनियम के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया था। यह आरोप उस समय का है जब वह एक अस्पताल में कार्यरत थीं।

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सूचना देने वाले पक्ष के अधिवक्ता ने प्रारंभिक आपत्ति उठाई कि चूंकि आवेदिका के खिलाफ पहले ही NBW और CrPC की धाराएं 82 व 83 के तहत उद्घोषणा व कुर्की की कार्रवाई हो चुकी है, इसलिए उनका अग्रिम जमानत आवेदन विचारणीय नहीं है।

वहीं, आवेदिका की ओर से यह दलील दी गई कि वह केवल एक मिडवाइफ नर्स थीं, जो सह-आरोपी डॉक्टर के अधीन कार्य कर रही थीं, और उनका प्रत्यक्ष रूप से इस घटना से कोई लेना-देना नहीं था।

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इसके अलावा यह भी बताया गया कि नवंबर 2024 में आरोपपत्र दायर हो चुका था और मई 2025 में संज्ञान भी लिया जा चुका था। लेकिन जब 10 अक्टूबर 2025 को NBW जारी हुआ, उससे कुछ दिन पहले ही, 6 अक्टूबर को आवेदिका ने एक पुत्र को जन्म दिया था।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल धारा 82 के तहत उद्घोषणा जारी होने भर से अग्रिम जमानत याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता, ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही निर्णय लिया जाना चाहिए।

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मोनिका की शारीरिक स्थिति और उससे संबंधित परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने उन्हें अग्रिम जमानत प्रदान कर दी।

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