120 साल पुराने धार्मिक विवाद को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति संजय किशन कौल को मध्यस्थ नियुक्त किया

कांचीपुरम स्थित ऐतिहासिक श्री देवराजस्वामी मंदिर में अनुष्ठानों के संचालन को लेकर श्रीवैष्णव परंपरा के दो संप्रदायों—वडकलै और थेंकलै—के बीच 120 वर्षों से चले आ रहे धार्मिक विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने अपने पूर्व न्यायाधीश और मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल को इस विवाद के प्रमुख मध्यस्थ के रूप में नियुक्त किया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ वडकलै संप्रदाय के अनुयायी एस. नारायणन की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी जिसमें मंदिर के गर्भगृह में वडकलै संप्रदाय को प्रार्थना करने की अनुमति नहीं दी गई थी।

पीठ ने आदेश में कहा, “सीनियर वकीलों ने सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए मध्यस्थता पर सहमति जताई है ताकि दैनिक अनुष्ठान शांति से संपन्न हो सकें। इस संदर्भ में हम न्यायमूर्ति संजय किशन कौल से अनुरोध करते हैं कि वे प्रमुख मध्यस्थ के रूप में कार्य करें।”

न्यायालय ने कहा कि न्यायमूर्ति कौल अपनी पसंद से दो अन्य ऐसे व्यक्तियों को साथ ले सकते हैं जो तमिल और संस्कृत भाषाओं, मंदिर के रीति-रिवाजों और धार्मिक इतिहास से भली-भांति परिचित हों। मामले की अगली सुनवाई 13 मार्च को होगी।

यह विवाद मंदिर में आध्यापक मिरासी (परंपरागत पूजा अधिकार) से जुड़ा है, जिसे थेंकलै संप्रदाय लंबे समय से निभाता आया है। वडकलै अनुयायियों का कहना है कि उन्हें एक धार्मिक समूह के रूप में मान्यता प्राप्त होने के बावजूद मंदिर में प्रार्थनाओं में भाग लेने से अवैध रूप से वंचित किया जा रहा है, जो संविधान के अनुच्छेद 25 में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।

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दिसंबर 2023 में मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ ने थेंकलै संप्रदाय के विशेष अधिकारों को बरकरार रखते हुए वडकलै पक्ष की याचिकाएं खारिज कर दी थीं। कोर्ट ने कहा था कि इस प्रकार की छूट पहले से स्थापित न्यायिक आदेशों का उल्लंघन होगा और इससे सार्वजनिक व्यवस्था भंग हो सकती है।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं सीएस वैद्यनाथन, सतीश परासरण और अरविंद दातार ने वडकलै पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि हाईकोर्ट ने पूर्व-सम्विधानिक निर्णयों पर अत्यधिक भरोसा किया और 1971 के तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त (संशोधन) अधिनियम की अनदेखी की, जो मंदिरों में वंशानुगत पूजा सेवा को समाप्त करता है।

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वहीं थेंकलै पक्ष की ओर से जवाबी दलील दी गई कि उनका अनुष्ठानिक अभ्यास 300 वर्षों से अधिक पुराना है और मंदिर की परंपरा में रचा-बसा है। अधिवक्ता अरविंद दातार ने न्यायालय से आग्रह किया कि लम्बी कानूनी लड़ाई की बजाय भाईचारे की भावना को बढ़ावा देते हुए सौहार्दपूर्ण हल तलाशा जाए।

उन्होंने यह भी बताया कि कोविड महामारी के दौरान एक समझौता किया गया था जिसके तहत दोनों संप्रदायों को क्रमश: 20-20 सेकंड तक अपने मंत्रों का उच्चारण करने की अनुमति दी गई थी, लेकिन बाद में मंदिर प्रशासन ने यह व्यवस्था समाप्त कर दी और केवल थेंकलै संप्रदाय को ही पूजा की अनुमति दी।

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सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की सहमति को ध्यान में रखते हुए यह निर्देश जारी किया कि मध्यस्थता के ज़रिये सौहार्दपूर्ण समाधान की संभावना तलाशी जाए। न्यायालय को उम्मीद है कि पूर्व न्यायमूर्ति कौल के नेतृत्व में बातचीत से इस दीर्घकालिक विवाद का सम्मानजनक समाधान निकल सकेगा।

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