सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम आदेश में मणिपुर हिंसा की पृष्ठभूमि में यौन अपराधों और अधिकारों के उल्लंघन की जांच एवं राहत प्रदान करने के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति के कार्यकाल को 31 जुलाई 2026 तक बढ़ा दिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि समिति का कार्य जुलाई 2025 के बाद भी जारी था, लेकिन औपचारिक रूप से उसका कार्यकाल नहीं बढ़ाया गया था, जिससे उसका संचालन नियमित नहीं था। कोर्ट ने अब इस पर औपचारिक मुहर लगा दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 32 और 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए अगस्त 2023 में यह समिति गठित की थी, जब मणिपुर में जारी जातीय हिंसा के बीच महिलाओं के साथ गंभीर यौन हिंसा की घटनाएं सामने आई थीं।
यह समिति निम्नलिखित पूर्व न्यायाधीशों को लेकर गठित की गई थी:
- जस्टिस गीता मित्तल, पूर्व मुख्य न्यायाधीश, जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट (अध्यक्ष)
- जस्टिस शालिनी फणसलकर जोशी, पूर्व न्यायाधीश, बॉम्बे हाईकोर्ट
- जस्टिस आशा मेनन, पूर्व न्यायाधीश, दिल्ली हाईकोर्ट
समिति को संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों और भारत की अंतरराष्ट्रीय दायित्वों (CEDAW) के तहत यौन हिंसा से पीड़ितों को न्याय, मुआवजा, पुनर्वास और मनो-सामाजिक सहायता प्रदान करने का जिम्मा सौंपा गया था।
समिति को यह भी अधिकार दिया गया था कि वह:
- पीड़ितों को कानूनी सहायता व परामर्श प्रदान करे
- चल-अचल संपत्ति के नुकसान के लिए मुआवजा वितरण की निगरानी करे
- मणिपुर सरकार को अनुच्छेद 357A CrPC के तहत निर्देश जारी कर सके
- प्रत्येक पंद्रह दिन में स्टेटस रिपोर्ट सीधे सुप्रीम कोर्ट को दे
पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने पहले कहा था कि इस समिति का गठन दो उद्देश्यों से हुआ —
- मणिपुर में बिगड़े हालात में न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा बहाल करना,
- और कानून के शासन की सर्वोच्चता को पुनः स्थापित करना।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि इस प्रकार की यौन हिंसा संवैधानिक नैतिकता का गंभीर उल्लंघन है और यह अनुच्छेद 14, 19 और 21 में प्रदत्त गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शारीरिक स्वायत्तता के अधिकारों का हनन है।
कोर्ट ने यह कार्यवाही सुओ मोटो तब शुरू की थी जब दो आदिवासी महिलाओं को नग्न अवस्था में घुमाने और उनके साथ यौन हिंसा का वीडियो वायरल हुआ था। पीड़ित महिलाओं ने बाद में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और आरोप लगाया कि मणिपुर पुलिस ने भीड़ का साथ दिया, बजाय उन्हें सुरक्षा देने के।
कोर्ट ने पाया कि एफआईआर दर्ज करने में अत्यधिक देरी हुई और जांच की प्रक्रिया ढीली और असंतोषजनक थी। कोर्ट ने कहा कि यह आपराधिक प्रक्रिया संहिता और पूर्व के फैसलों के खिलाफ है।
हालांकि कोर्ट ने विशेष जांच दल (SIT) बनाने से इनकार किया, लेकिन पूर्व आईपीएस अधिकारी दत्तात्रेय पडसलगीकर को जांच की निगरानी हेतु नियुक्त किया गया ताकि निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित हो।
इसके अलावा, कोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया कि वे गुवाहाटी (असम) में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें नामित करें, जिनकी जांच CBI को सौंपी गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट किया था कि ये ट्रायल गुवाहाटी में ही जारी रहेंगे और पीड़ितों को निष्पक्ष और शीघ्र न्याय सुनिश्चित किया जाएगा।

