सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा के मानकों को सुदृढ़ करने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि ‘हायर सेकेंडरी स्कूल टीचर’ (HSST) के पद पर नियुक्ति के लिए उम्मीदवार के पास संबंधित विषय में ही ‘राज्य पात्रता परीक्षा’ (SET) की योग्यता होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि भले ही वैधानिक नियमों में SET की आवश्यकता के साथ ‘संबंधित विषय में’ शब्द का स्पष्ट रूप से बार-बार उल्लेख न किया गया हो, लेकिन कानून की उद्देश्यपूर्ण और संदर्भगत व्याख्या, परीक्षा के स्वरूप के साथ मिलकर, विषय-विशिष्ट योग्यता को अनिवार्य बनाती है।
मामले का मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या ‘केरल शिक्षा नियमावली’ (KER) के अध्याय XXXII के नियम 6.2(24)(iii) के तहत नियुक्ति के विषय (इस मामले में अर्थशास्त्र) में ही SET योग्यता होना आवश्यक है या किसी भी विषय में SET उत्तीर्ण होना पर्याप्त है।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने ज़ुबैर पी. द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया और केरल हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी असंबंधित विषय में SET योग्यता होना एक विशेष शिक्षण पद के लिए निर्धारित वैधानिक मानदंडों को पूरा नहीं करता है।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता, ज़ुबैर पी., ने 2002 में ‘अपर प्राइमरी स्कूल टीचर’ के रूप में सेवा शुरू की थी और 2004 में उन्हें ‘हाई स्कूल टीचर’ के रूप में पदोन्नत किया गया था। 15 जुलाई, 2021 को उन्हें सक्षम अधिकारी द्वारा ‘अर्थशास्त्र’ के HSST पद पर स्थानांतरित कर नियुक्त किया गया। हालांकि अपीलकर्ता के पास अर्थशास्त्र में मास्टर डिग्री थी, लेकिन उनकी SET योग्यता मलयालम विषय में थी।
एक अन्य उम्मीदवार, प्रतिवादी संख्या 4, ने इस नियुक्ति को चुनौती देते हुए दावा किया कि उनके पास अर्थशास्त्र में आवश्यक SET योग्यता है। इसके बाद, प्रतिवादी-प्राधिकारियों ने 18 जून, 2022 को अपीलकर्ता की नियुक्ति को दो आधारों पर मंजूरी देने से इनकार कर दिया:
- अर्थशास्त्र में SET योग्यता का न होना।
- SET से छूट के लिए आवश्यक दस वर्ष के हाई स्कूल शिक्षण अनुभव का अभाव (अपीलकर्ता की सेवा अवधि 9 वर्ष, 10 महीने और 14 दिन थी)।
हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश और फिर खंडपीठ (Division Bench) दोनों ने इस अस्वीकृति को बरकरार रखा, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से: वरिष्ठ वकील श्री निखिल गोयल और श्री हारिस बीरन ने तर्क दिया कि नियम 6.2(24) में मास्टर डिग्री और बी.एड. के लिए ‘संबंधित विषय’ शब्द का प्रयोग किया गया है, लेकिन उप-धारा (iii) में SET आवश्यकता के लिए जानबूझकर इस शब्द को छोड़ दिया गया है। उन्होंने दलील दी कि हाईकोर्ट ने वैधानिक प्रावधान में अपनी ओर से शब्द जोड़ दिए हैं और SET को केवल शिक्षण अभिरुचि के मानक के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि विषय-विशिष्ट परीक्षा के रूप में।
राज्य और प्रतिवादी संख्या 4 की ओर से: राज्य और प्रतिवादी संख्या 4 के वकील ने तर्क दिया कि SET परीक्षा योजना के विवरण (prospectus) के अनुसार, इसमें ‘पेपर II’ विशेष रूप से पोस्ट ग्रेजुएट स्तर पर उम्मीदवार के विशेषज्ञता वाले विषय पर आधारित होता है। उन्होंने कहा कि विधायिका का उद्देश्य उच्च माध्यमिक स्तर पर शैक्षणिक मानकों को सुनिश्चित करना था, जिसके लिए विषय की विशेषज्ञता अनिवार्य है।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की शाब्दिक व्याख्या को खारिज करते हुए कहा कि वैधानिक प्रावधानों को अलग-थलग करके नहीं पढ़ा जा सकता। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया बनाम पीयरलेस जनरल फाइनेंस एंड इन्वेस्टमेंट कंपनी लिमिटेड (1987) 1 SCC 424 का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:
“व्याख्या पाठ (text) और संदर्भ (context) पर निर्भर होनी चाहिए। वे व्याख्या के आधार हैं। कोई कह सकता है कि यदि पाठ बनावट है, तो संदर्भ वह है जो उसे रंग देता है। किसी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दोनों महत्वपूर्ण हैं। वह व्याख्या सबसे अच्छी है जो पाठ्य व्याख्या को संदर्भ के साथ मिलाती है।”
पीठ ने गौर किया कि SET विषय-वार आयोजित की जाती है और इसमें पीजी-स्तर की विशेषज्ञता का परीक्षण करने वाला पेपर शामिल होता है। इस आधार पर कोर्ट ने कहा:
“इसलिए, जब SET योग्यता स्वयं विषय-विशिष्ट है, तो यह अप्रासंगिक है कि नियम 6.2(24)(iii) में ‘संबंधित विषय में’ शब्द दिए गए हैं या नहीं।”
शैक्षणिक प्रभाव पर कोर्ट ने टिप्पणी की:
“अपीलकर्ता की व्याख्या को स्वीकार करने का परिणाम यह होगा कि पूरी तरह से असंबंधित विषय में पात्रता रखने वाला उम्मीदवार किसी दूसरे विशेष विषय को पढ़ाने का दावा कर सकता है। ऐसी व्याख्या उच्च माध्यमिक स्तर पर SET योग्यता निर्धारित करने के उद्देश्य को ही विफल कर देगी और इसके परिणाम हास्यास्पद होंगे।”
अंतिम निर्णय
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता अर्थशास्त्र के HSST पद के लिए योग्य नहीं थे और प्रतिवादी संख्या 4 की पात्रता की पुष्टि की।
- SET की अनिवार्यता: कोर्ट ने कहा कि SET नियुक्ति के विषय के अनुरूप होनी चाहिए।
- छूट: नियम 10(4) के तहत अपीलकर्ता को छूट के लिए अयोग्य पाया गया क्योंकि उनकी सेवा अवधि अनिवार्य दस वर्ष से कम थी।
- वसूली पर रोक: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता को उनके कार्यकाल के दौरान भुगतान किए गए किसी भी अतिरिक्त वेतन की वसूली प्राधिकारियों द्वारा नहीं की जाएगी।
- समय सीमा: प्रतिवादी-प्राधिकारियों को दो महीने के भीतर प्रतिवादी संख्या 4 की नियुक्ति के संबंध में आवश्यक आदेश जारी करने का निर्देश दिया गया है।
केस विवरण:
- केस का शीर्षक: ज़ुबैर पी. बनाम केरल राज्य और अन्य
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या ___ / 2026 (@SLP (C) No. 17785 / 2024)
- पीठ: जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस विपुल एम. पंचोली

