पूर्व क्लाइंट की संपत्ति से जुड़े मामलों में जज का सुनवाई करना न्यायिक मर्यादा के खिलाफ: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने जोर देकर कहा है कि न्यायिक मर्यादा के हित में किसी जज को अपने पूर्व क्लाइंट से जुड़ी जमीन से संबंधित कार्यवाही में सुनवाई या आदेश जारी नहीं करना चाहिए। उत्तराखंड हाईकोर्ट के एक एकल जज द्वारा पारित कई अंतरिम आदेशों की चुनौती पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी की। हाईकोर्ट के जज पूर्व में संबंधित भूमि से जुड़े मामले में एक पक्षकार का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। हालांकि, पेड़ों की कटाई पर लगी रोक से जुड़े मौजूदा हलफनामों को ध्यान में रखते हुए, शीर्ष अदालत ने इस स्तर पर अंतरिम आदेशों को रद्द करने से इनकार कर दिया और सभी मुद्दों को हाईकोर्ट की उपयुक्त पीठ के निर्णय के लिए खुला छोड़ दिया। इसके साथ ही मामले को प्रशासनिक निर्देशों के लिए उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेज दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला प्रतीक रिसॉर्ट्स एंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। याचिका में उत्तराखंड हाईकोर्ट की नैनीताल पीठ द्वारा आपराधिक रिट याचिका संख्या 762/2026 में पारित 20 मई 2026, 21 मई 2026, 1 जून 2026, 17 जून 2026 और 20 जुलाई 2026 के अंतरिम आदेशों को चुनौती दी गई थी।

हाईकोर्ट के एकल जज के समक्ष आपराधिक रिट याचिका संख्या 1431/2026 और 762/2026 लंबित थीं। याचिकाकर्ता कंपनी, प्रतीक रिसॉर्ट्स एंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड ने कार्यवाही में पक्षकार बनने के लिए एक आवेदन दायर किया था, जो विचाराधीन था। मुख्य बात यह थी कि सुनवाई कर रहे हाईकोर्ट के जज पहले याचिकाकर्ता कंपनी के लिए 2013 की एक याचिका (WPMS नंबर 1478/2013) में वकील के रूप में पेश हो चुके थे। यह याचिका उसी भूखंड से संबंधित थी जो वर्तमान आपराधिक रिट याचिकाओं में जांच और अंतरिम आदेशों का विषय था।

अदालत के समक्ष पेश तथ्य

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में लाया कि वर्तमान कार्यवाही में शामिल जमीन वही है जो 2013 की रिट याचिका में शामिल थी, जहां हाईकोर्ट के जज ने कंपनी के वकील के रूप में काम किया था। इसके अलावा, यह भी रेखांकित किया गया कि हाईकोर्ट ने आक्षेपित अंतरिम आदेशों के माध्यम से मूल रिट याचिकाओं के दायरे को बढ़ा दिया था, जो उनकी मूल प्रार्थनाओं से परे था।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जज द्वारा मामले पर सुनवाई करने और इसके दायरे को बढ़ाने पर गंभीर आपत्ति व्यक्त की। न्यायिक नैतिकता और जज के अलग हटने (recusal) के मूल मुद्दे पर पीठ ने कहा:

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“ऐसी परिस्थितियों में, न्यायिक मर्यादा के हित में विद्वान जज को मामले पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी और आदेश पारित नहीं करना चाहिए था। यह सर्वविदित सिद्धांत है कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। किसी पूर्व क्लाइंट, जो कि एक निजी संस्था है, के पक्ष या विपक्ष में आदेश पारित करने से उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती है।”

मूल संदर्भ से परे रिट याचिकाओं के दायरे को बढ़ाने के विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“इसके अलावा, हम यह भी ध्यान में रख सकते हैं कि विद्वान जज के समक्ष दायर रिट याचिकाएं बिल्कुल अलग मुद्दों पर थीं और आक्षेपित अंतरिम आदेशों के माध्यम से विद्वान जज द्वारा उन रिट याचिकाओं के दायरे को बढ़ा दिया गया था। भले ही ऐसा प्रयास सर्वोत्तम मंशा से किया गया हो, लेकिन विद्वान जज के लिए ऐसी रिट याचिकाओं में ऐसा करना उचित नहीं था, जिनका उन मुद्दों से कोई लेना-देना नहीं था जिन्हें संबोधित करने का प्रयास किया गया था।”

अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि यदि किसी जज को जनहित के संभावित मुद्दे दिखाई देते हैं तो क्या प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए:

“यदि विद्वान जज की यह राय थी कि यह ऐसा मामला है जिसे जनहित में उठाया जाना आवश्यक था, तो हाईकोर्ट में गठित जनहित याचिका समिति के समक्ष मामला रखकर या उचित प्रक्रिया के अनुसार आवश्यक उपाय करने के लिए माननीय मुख्य न्यायाधीश को मामला संदर्भित करके उपयुक्त कदम उठाए जा सकते थे।”

अदालत का निर्णय

प्रक्रियात्मक खामी को रेखांकित करने के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने आक्षेपित अंतरिम आदेशों को रद्द करने या पर्यावरण संरक्षण के संबंध में दिए गए हलफनामों को हटाने से परहेज किया। कोर्ट ने कहा कि पेड़ न काटने के संबंध में हलफनामे दिए गए हैं, जो फिलहाल प्रभावी हैं।

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तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने आक्षेपित अंतरिम आदेशों की वैधता सहित सभी तथ्यात्मक और कानूनी प्रश्नों को खुला छोड़ दिया, ताकि जब हाईकोर्ट की उपयुक्त पीठ मामले की सुनवाई करे तो वह इस पर निर्णय ले सके।

शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि इस आदेश की प्रति उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेजी जाए ताकि आपराधिक रिट याचिका संख्या 762/2026 और 1431/2026 को सूचीबद्ध करने के साथ-साथ यदि आवश्यक हो तो जनहित याचिका शुरू करने के संबंध में उचित कदम उठाए जा सकें। इन निर्देशों के साथ विशेष अनुमति याचिकाएं निस्तारित कर दी गईं।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: प्रतीक रिसॉर्ट्स एंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम पुनीत अग्रवाल व अन्य
वाद संख्या: स्पेशल लीव पिटीशन (क्रिमिनल) डायरी नंबर 43814/2026
पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा
निर्णय की तिथि: 27 जुलाई, 2026

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