क्या केवल दीवानी मुकदमे के लंबित होने या निपटारे के आधार पर आपराधिक केस रद्द हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने दिया अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर आपराधिक कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता कि मामला दीवानी (Civil) प्रकृति का है या उस पर किसी सक्षम सिविल कोर्ट का फैसला आ चुका है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने केवल दीवानी अदालत के निष्कर्षों के आधार पर धोखाधड़ी और जालसाजी के मुकदमे को रद्द कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने सी.एस. प्रसाद बनाम सी. सत्यकुमार और अन्य के मामले में अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि एक ही तथ्यों के सेट से दीवानी और आपराधिक, दोनों तरह के दायित्व (Liability) उत्पन्न हो सकते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद चेन्नई स्थित अचल संपत्तियों के संबंध में वर्ष 2010 और 2012 में निष्पादित तीन पंजीकृत सेटलमेंट डीड (Settlement Deeds) से जुड़ा है। ये संपत्तियां मूल रूप से स्वर्गीय डॉ. सी. सत्यनारायण और उनकी पत्नी स्वर्गीय श्रीमती सी. लक्ष्मी देवी की थीं। इस दंपत्ति के तीन बेटे थे: प्रतिवादी संख्या 1 (डॉ. सी. सत्यकुमार), अपीलकर्ता (डॉ. सी.एस. प्रसाद), और डॉ. सी. रंगा राव (जिनका निधन हो चुका है)।

आरोप है कि पिता ने अपनी मृत्यु से ठीक पहले मार्च 2012 में प्रतिवादी संख्या 1 के पक्ष में एक पावर ऑफ अटॉर्नी (PoA) निष्पादित की थी, जिसका उपयोग करके सेटलमेंट डीड प्रतिवादी संख्या 1 के पक्ष में कर दी गई।

वर्ष 2014 में, एक भतीजे (प्रतिवादी संख्या 5) ने एक सिविल सूट (O.S. No. 2190 of 2014) दायर किया, जिसमें इन डीड्स को शून्य घोषित करने की मांग की गई। अपीलकर्ता इस मुकदमे में प्रतिवादी थे, लेकिन वे कार्यवाही में एकपक्षीय (Ex-parte) रहे। 24 जनवरी, 2023 को सिविल कोर्ट ने मुकदमे को खारिज कर दिया और डीड्स की वैधता को बरकरार रखा। इस फैसले के खिलाफ अपील हाईकोर्ट में लंबित है।

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इसी बीच, अपीलकर्ता ने 8 जनवरी, 2020 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें धोखाधड़ी, प्रतिरूपण (Impersonation) और जालसाजी का आरोप लगाया गया। मजिस्ट्रेट के आदेश पर आईपीसी की धारा 417, 420, 465, 468, 471 और 120B के तहत एफआईआर दर्ज की गई और बाद में चार्जशीट दाखिल हुई।

मद्रास हाईकोर्ट ने 22 अक्टूबर, 2024 को यह कहते हुए आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी कि दस्तावेजों की वैधता को सिविल कोर्ट ने सही ठहराया है और आपराधिक मुकदमा चलाना कानून का दुरुपयोग होगा।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता का तर्क: अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि प्रतिवादी संख्या 1 ने पावर ऑफ अटॉर्नी का दुरुपयोग किया और अपने ही पक्ष में डीड निष्पादित करा लीं। यह भी कहा गया कि ये दस्तावेज धोखे से और पिता की मानसिक स्थिति का फायदा उठाकर बनवाए गए थे। अपीलकर्ता का कहना था कि यदि अपराध के तत्व (Ingredients of offence) मौजूद हैं, तो दीवानी और आपराधिक कार्यवाही साथ-साथ चल सकती हैं।

प्रतिवादियों का तर्क: प्रतिवादी पक्ष ने हाईकोर्ट के आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि यह पारिवारिक संपत्ति विवाद है जिसे आपराधिक रंग दिया जा रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि अपीलकर्ता 2014 से इन लेन-देन के बारे में जानते थे और जानबूझकर सिविल सूट में शामिल नहीं हुए। यह भी कहा गया कि शिकायत बहुत देरी से (6 साल बाद) दर्ज कराई गई है और यह केवल बदले की भावना से प्रेरित है।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट द्वारा कार्यवाही रद्द करने के औचित्य की जांच की।

धारा 482 सीआरपीसी का दायरा: स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल और नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर के फैसलों का हवाला देते हुए, पीठ ने दोहराया कि एफआईआर रद्द करने की शक्ति का उपयोग बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को आरोपों की सत्यता की जांच करने के बजाय केवल यह देखना चाहिए कि क्या प्रथम दृष्टया अपराध बनता है या नहीं।

दीवानी बनाम आपराधिक दायित्व: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण को गलत माना कि सिविल कोर्ट के डिक्री के कारण आपराधिक केस नहीं चल सकता। जस्टिस मिश्रा ने फैसले में लिखा:

“आपराधिक न्यायशास्त्र का यह स्थापित सिद्धांत है कि दीवानी दायित्व और आपराधिक दायित्व एक ही तथ्यों से उत्पन्न हो सकते हैं। दीवानी कार्यवाही का लंबित होना या उसका निष्कर्ष आपराधिक अभियोजन को नहीं रोकता, यदि आपराधिक अपराध के तत्व प्रकट होते हैं।”

ह़ालिया फैसले कात्यायनी बनाम सिद्धार्थ पी.एस. रेड्डी (2025) का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:

“सिविल कोर्ट की डिक्री न तो आपराधिक इरादे (Criminal Intent) पर कोई निष्कर्ष दर्ज करती है और न ही जालसाजी या धोखाधड़ी जैसे अपराधों के अस्तित्व पर। इसलिए, केवल दीवानी फैसले को क्वैशिंग (Quashing) के चरण में आपराधिक दोषसिद्धि के लिए निर्णायक नहीं माना जा सकता।”

देरी और आचरण पर टिप्पणी: सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता द्वारा देरी से शिकायत दर्ज कराने और सिविल सूट में भाग न लेने के आधार पर हाईकोर्ट द्वारा केस रद्द करने को भी गलत ठहराया। कोर्ट ने कहा:

“शिकायत दर्ज करने में देरी अपने आप में आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का आधार नहीं हो सकती। देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण है या नहीं, या यह अभियोजन की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है या नहीं, यह सब ट्रायल कोर्ट के समक्ष साक्ष्य का विषय है, न कि हाईकोर्ट द्वारा धारा 482 के तहत सरसरी तौर पर तय करने का विषय।”

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पीठ ने जोर दिया कि निष्पादकों की मानसिक स्थिति, धोखाधड़ी के इरादे और संपत्ति का लाभ कैसे उठाया गया, इन सभी मुद्दों पर साक्ष्यों के आधार पर पूर्ण परीक्षण (Trial) की आवश्यकता है।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के 22 अक्टूबर, 2024 के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि:

“सी.सी. नंबर 2 ऑफ 2023 को ट्रायल के लिए विद्वान विशेष मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट-I, लैंड ग्रैबिंग मामलों की विशेष अदालत, अल्लिकुलम, एग्मोर, चेन्नई के समक्ष बहाल किया जाए।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट इस फैसले में की गई टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र रूप से मेरिट पर फैसला करेगा।

केस डिटेल्स

केस का नाम: सी.एस. प्रसाद बनाम सी. सत्यकुमार और अन्य

केस संख्या: क्रिमिनल अपील नंबर 140 ऑफ 2026 (एस.एल.पी. (क्रिमिनल) नंबर 397 ऑफ 2025 से उद्भूत)

कोरम: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा 

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