दिल्ली हाईकोर्ट ने फीस वृद्धि पर मंजूरी की शर्त वाली कानून को चुनौती देने वाली अल्पसंख्यक स्कूलों की याचिकाओं पर DOE और उपराज्यपाल से मांगा जवाब

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को कई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों द्वारा दायर उन याचिकाओं पर दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय (DoE) और उपराज्यपाल (LG) से जवाब मांगा है, जिनमें निजी स्कूलों में फीस बढ़ोतरी के लिए सरकारी मंजूरी को अनिवार्य बनाने वाले कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने संबंधित पक्षों को छह सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई के लिए मामला 12 मार्च को सूचीबद्ध किया।

याचिकाओं में दिल्ली स्कूल शिक्षा (फीस निर्धारण और विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम, 2025 और उसके तहत बनाए गए नियमों को चुनौती दी गई है। इस अधिनियम के तहत सभी निजी स्कूलों को किसी भी प्रकार की फीस वृद्धि से पहले स्कूल स्तरीय फीस नियामक समिति (SLFRC) की स्वीकृति लेनी होगी।

इस समिति में स्कूल प्रबंधन के प्रतिनिधि, प्राचार्य, तीन शिक्षक, पांच अभिभावक और शिक्षा निदेशालय का एक प्रतिनिधि शामिल होता है। समिति के सदस्यों का चयन पर्यवेक्षकों की उपस्थिति में लॉटरी के माध्यम से किया जाएगा ताकि पारदर्शिता बनी रहे। समिति को स्कूल प्रबंधन द्वारा प्रस्तावित फीस का मूल्यांकन कर 30 दिनों में निर्णय देना होगा।

हाईकोर्ट ने SLFRC के गठन की अंतिम तिथि 10 जनवरी से बढ़ाकर 20 जनवरी कर दी है, और स्कूल प्रबंधन द्वारा प्रस्तावित फीस जमा करने की अंतिम तिथि 25 जनवरी से बढ़ाकर 5 फरवरी कर दी गई है।

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याचिकाकर्ता स्कूलों ने दलील दी है कि संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत उन्हें शिक्षा संस्थानों की स्थापना और संचालन का मौलिक अधिकार प्राप्त है, जिसमें राज्य सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

“कोई भी ऐसा कानून जो स्कूलों के प्रशासन से जुड़ी समितियों में बाहरी व्यक्तियों को शामिल करता है, वह अनुच्छेद 30 के तहत प्राप्त स्वायत्तता का उल्लंघन है,” याचिका में कहा गया। याचिकाकर्ताओं का यह भी तर्क है कि “अनुच्छेद 30(1) के तहत अधिकार के प्रयोग के लिए राज्य से पूर्व अनुमति नहीं ली जा सकती।”

शिक्षा निदेशालय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. वी. राजू ने कानून का बचाव करते हुए कहा कि इसमें कोई असंवैधानिकता नहीं है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यक संस्थानों को अधिकार जरूर प्राप्त हैं, लेकिन राज्य उनके प्रशासन पर युक्तिसंगत नियामक नियंत्रण लागू कर सकता है।

गुरुवार को हाईकोर्ट ने ऐसी ही याचिकाओं के एक अन्य समूह पर भी इसी प्रकार का आदेश पारित किया था।

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वर्तमान शैक्षणिक सत्र से लागू हो रहे इस नए कानून का असर सैकड़ों निजी और अल्पसंख्यक स्कूलों पर पड़ सकता है। अदालत की अगली सुनवाई अब 12 मार्च को होगी, जिसमें यह तय होगा कि क्या यह कानून अल्पसंख्यक संस्थानों की स्वायत्तता के विरुद्ध है या एक वैध नियामक उपाय।

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