दो माह में स्थायी कमीशन देने की प्रक्रिया पूरी करें:– सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली—- सुप्रीम कोर्ट में महिला सैन्य अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के मामले में कहा कि सेना द्वारा अपनाए जा रहे मूल्यांकन के मानक मनमाने अर्तर्किक हैं। जिनको कोर्ट ने निरस्त करते हुए कहा कि हमारे इस समाज मे पुरुषों द्वारा पुरुषों के किया ढांचा बनाया गया है। समानता का सतही चेहरा संविधान के निहित सिदाँतों के लिए सही नही है। कोर्ट ने 650 महिला शार्ट सर्विस कमीशन देने पर विचार विमर्श कर दो माह में प्रक्रिया पूर्ण करने का निर्देश दिया है। 

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने सेना के मानकों को संस्थागत भेदभाव करार देते हुए कहा समाज की कुकग संरचनायें जो बाहरी तौर पर हानिरहित नजर आती है।  वे कपटपूर्ण पितृसत्तात्मक व्यवस्था का संकेत है। आजादी के उपरांत तमाम प्रयत्न किए जा रहे हैं कि महिलाओं व पुरुषों के मध्य खाई को पाटा जा सके और दोनों को समान अवसर प्राप्त है।

महज गर्व से कहना यह पर्याप्त नही है कि महिलाओं को पुरुष अधिकारियों के समकक्ष राखने के ये मानक अपनाए गए हैं। कोर्ट ने माना कि सेना की वार्षियक गोपनीय रिपोर्ट मूल्यांकन और चिकित्सा फिटनेस  मानदंड महिला अधिकारियों के विरुध्द भेदभाव करते हैं। 

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