सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार की उस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसने 2023 के संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए मूल याचिकाकर्ताओं को नोटिस जारी किया। इनमें स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगज़ीन्स सहित अन्य पक्ष शामिल हैं।
पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से अपील दाखिल करने में हुई लगभग 400 दिनों की देरी को भी स्वीकार करते हुए उसे माफ कर दिया और प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से दलील देते हुए कहा कि सरकार का उद्देश्य सोशल मीडिया पर सामग्री को पूरी तरह ब्लॉक करना नहीं है, बल्कि गलत और भ्रामक सूचनाओं को नियंत्रित करना है। उन्होंने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने की मांग भी की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर ऐसा करने से इनकार कर दिया।
इस दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के मौजूदा संचालन पर चिंता भी जताई। उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड पर रखे गए उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि कुछ प्लेटफॉर्म पर बेहद खतरनाक तरीके से झूठी सूचनाएं फैल रही हैं। उन्होंने खास तौर पर भारतीय सेना और राष्ट्रीय नीतियों से जुड़े फर्जी संदेशों का उल्लेख किया और सवाल उठाया कि क्या मौजूदा व्यवस्था में पूरी जिम्मेदारी केवल सरकारी तंत्र पर डाल दी गई है, जबकि मध्यस्थ प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही सीमित है।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि मौजूदा नियमों के तहत ही आपत्तिजनक सामग्री को 24 घंटे के भीतर हटाने की व्यवस्था पहले से मौजूद है। उनका कहना था कि 2023 के संशोधित नियमों में “भ्रामक सूचना” की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे यह प्रावधान अस्पष्ट और समस्याग्रस्त बन जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार द्वारा जिन उदाहरणों का हवाला दिया गया है, उनमें से कई सामग्री पहले ही मौजूदा प्रक्रिया के तहत हटाई जा चुकी थी।
यह पूरा विवाद सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2023 से जुड़ा है। इन संशोधनों के तहत केंद्र सरकार को एक फैक्ट-चेक यूनिट (FCU) स्थापित करने का अधिकार दिया गया था, जो सोशल मीडिया पर “सरकारी कामकाज” से संबंधित ऐसी सामग्री की पहचान कर सके जिसे वह फर्जी, गलत या भ्रामक मानती है।
नियमों के अनुसार यदि फैक्ट-चेक यूनिट किसी पोस्ट या सामग्री को फर्जी या भ्रामक घोषित करती, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे एक्स, फेसबुक या यूट्यूब को उसे हटाना पड़ता। ऐसा न करने पर उन्हें अपने “सेफ हार्बर” संरक्षण के खोने का खतरा रहता, जिसके तहत वे उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए सामान्यतः जिम्मेदार नहीं ठहराए जाते।
इन संशोधित नियमों को बॉम्बे हाईकोर्ट में कई याचिकाओं के जरिए चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं में कुणाल कामरा, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्ट एंड डिजिटल एसोसिएशन और एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगज़ीन्स शामिल थे।
मामले में पहले हाईकोर्ट की खंडपीठ ने विभाजित फैसला दिया था। इसके बाद न्यायमूर्ति ए. एस. चंदूरकर को तीसरे न्यायाधीश के रूप में मामला सौंपा गया। उन्होंने 20 सितंबर 2024 को अपने निर्णय में कहा कि संशोधित नियम अत्यधिक व्यापक और अस्पष्ट हैं और इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर “चिलिंग इफेक्ट” पड़ने की आशंका है।
तीसरे न्यायाधीश की राय के आधार पर न्यायमूर्ति ए. एस. गडकरी और न्यायमूर्ति नीला गोखले की खंडपीठ ने 26 सितंबर 2024 को अंतिम निर्णय सुनाते हुए नियम 3(1)(v) को असंवैधानिक घोषित कर दिया और सभी याचिकाओं को स्वीकार कर लिया।
अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष केंद्र सरकार की अपील पर सुनवाई होने से सोशल मीडिया पर गलत सूचनाओं के नियमन और फैक्ट-चेक यूनिट की वैधता से जुड़ा यह महत्वपूर्ण संवैधानिक विवाद आगे विचाराधीन रहेगा।

