सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार के उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी जिसमें देश के विभिन्न ट्रिब्यूनलों के अध्यक्षों और सदस्यों का कार्यकाल अस्थायी रूप से 8 सितंबर तक बढ़ाने की बात कही गई थी। अदालत ने कहा कि नए कानून पर विचार जारी रहने के दौरान ट्रिब्यूनलों के कामकाज में बाधा न आए, इसलिए यह अंतरिम व्यवस्था आवश्यक है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह अनुमति तब दी जब अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार ट्रिब्यूनलों की नियुक्ति और कार्यप्रणाली से संबंधित एक नया विधेयक लाने पर विचार कर रही है। यह विधेयक संसद के मौजूदा बजट सत्र या आगामी मानसून सत्र में पेश किया जा सकता है।
अटॉर्नी जनरल ने अदालत को बताया कि सरकार के विभिन्न स्तरों पर इस विषय पर विचार-विमर्श जारी है। ऐसे में जिन ट्रिब्यूनल सदस्यों का कार्यकाल जल्द समाप्त होने वाला है, उन्हें 8 सितंबर तक सेवा में बनाए रखने का निर्णय लिया गया है ताकि संस्थानों के कामकाज में कोई व्यवधान न आए।
उन्होंने बताया कि फिलहाल करीब 21 सदस्य सेवानिवृत्ति के कगार पर हैं, जिनके कार्यकाल को अस्थायी रूप से बढ़ाया जाएगा। वेंकटरमणी ने कहा कि ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट, 2021 के तहत नियुक्त सभी सदस्य फिलहाल अपने पद पर बने रहेंगे और नए कानून के लागू होने के बाद आगे की व्यवस्था तय की जाएगी।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट, 2021 के उन प्रावधानों को रद्द कर दिया था जो ट्रिब्यूनल सदस्यों की नियुक्ति और कार्यकाल से जुड़े थे। अदालत ने कहा था कि ये प्रावधान पहले दिए गए न्यायिक निर्णयों के अनुरूप नहीं हैं।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने ट्रिब्यूनलों की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रिब्यूनल सदस्यों के कामकाज और ईमानदारी का मूल्यांकन कौन करेगा।
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की,
“वे न तो सरकार के प्रति जवाबदेह हैं और न ही हमारे प्रति। फिर उनकी कार्यप्रणाली और ईमानदारी का आकलन कौन करेगा?”
उन्होंने यह भी कहा कि केवल सामूहिक आदेश देकर कार्यकाल बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी सदस्य का काम संतोषजनक नहीं है, तो उसके कार्यकाल के विस्तार पर भी विचार होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान कैट बार एसोसिएशन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय जैन ने अदालत को बताया कि पिछले वर्ष दिए गए मद्रास बार एसोसिएशन मामले के फैसले में ट्रिब्यूनल सदस्यों के लिए कम से कम पांच वर्ष का कार्यकाल अनिवार्य बताया गया था।
उन्होंने कहा कि करीब 31 सदस्य जल्द सेवानिवृत्त होने वाले हैं, जिससे ट्रिब्यूनलों के कामकाज पर असर पड़ सकता है।
जैन ने एक और चिंता जताई कि कई मामलों में प्रशासनिक सदस्य, न्यायिक सदस्य के सेवानिवृत्त होने के बाद कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में कार्य करने लगते हैं, जो न्यायिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह चिंता पहले भी अदालत के सामने आ चुकी है और ट्रिब्यूनलों की व्यवस्था को लेकर व्यापक सुधार की आवश्यकता है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ट्रिब्यूनलों के लिए ऐसा व्यापक कानून होना चाहिए जिसमें उनकी जवाबदेही तय हो सके।
उन्होंने कहा,
“आप ट्रिब्यूनलों को पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में नहीं रख सकते, क्योंकि तब आलोचना होगी। उन्हें पूरी तरह न्यायपालिका के नियंत्रण में भी नहीं रखा जा सकता। फिर उनकी जवाबदेही किसके प्रति होगी?”
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि जब कोई ट्रिब्यूनल फैसला सुरक्षित रखता है, तो वह गोपनीय रूप से अपने अध्यक्ष या प्रेसीडेंट को इसकी जानकारी दे और यह भी बताए कि फैसला लिखने की जिम्मेदारी किस सदस्य को सौंपी गई है और इसमें कितना समय लगेगा।
इससे पहले 26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई थी। अदालत ने कहा था कि जवाबदेही के अभाव में कई ट्रिब्यूनल “बोझ” और “अव्यवस्था” बन गए हैं।
पीठ ने यह भी चिंता व्यक्त की थी कि एक वित्तीय ट्रिब्यूनल में तकनीकी सदस्य फैसले लिखने का काम बाहर से करवा रहे थे, जो न्यायिक प्रणाली के लिए गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
अदालत ने यह भी कहा था कि ट्रिब्यूनल सरकार द्वारा बनाए गए संस्थान हैं, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में वे किसी स्पष्ट जवाबदेही तंत्र के बिना “नो-मैन्स लैंड” की तरह काम कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई मई में की जाएगी, जब सरकार द्वारा प्रस्तावित नए कानून की प्रगति की समीक्षा की जाएगी।

