दिल्ली दंगा मामला: देवांगना कलीता की केस डायरी पुनर्निर्माण की मांग सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को छात्र कार्यकर्ता देवांगना कलीता की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले में केस डायरी के पुनर्निर्माण की मांग की गई थी। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के 2025 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें पुनर्निर्माण की मांग को आंशिक रूप से अस्वीकार किया गया था, लेकिन दस्तावेजों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया गया था।

सुनवाई के दौरान कलीता की ओर से पेश वकील ने आरोप लगाया कि अभियोजन द्वारा पेश किए गए कुछ दस्तावेज “एंटीडेटेड” यानी पूर्व तारीख डालकर तैयार किए गए प्रतीत होते हैं और संभवतः जाली हैं। वकील ने अदालत से केस डायरी को दोबारा तैयार करने और सुरक्षित रखने का निर्देश देने की मांग की।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील पर सवाल उठाते हुए कहा कि मामले का ट्रायल तीन साल पहले शुरू हो चुका है। पीठ ने पूछा कि इतने लंबे समय के दौरान इस मुद्दे को लेकर पहले क्या कदम उठाए गए थे।

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न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने सुनवाई के दौरान दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 172(3) का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून के अनुसार आरोपी को केस डायरी तक सीधे पहुंच का अधिकार नहीं होता। पीठ ने माना कि दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने का कोई आधार नहीं है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 22 सितंबर 2025 को कलीता की उस याचिका को आंशिक रूप से खारिज कर दिया था, जिसमें केस डायरी के पुनर्निर्माण की मांग की गई थी। हालांकि अदालत ने केस डायरी को सुरक्षित रखने की मांग स्वीकार कर ली थी।

इससे पहले 2 दिसंबर 2024 को हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए दिल्ली पुलिस को केस डायरी सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था।

दरअसल, कलीता ने ट्रायल कोर्ट के 6 नवंबर 2024 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अदालत ने केस डायरी मंगाने के उनके अनुरोध को खारिज कर दिया था। दिल्ली पुलिस ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि इससे मुकदमे की सुनवाई और लंबी खिंच सकती है।

ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि इस चरण पर वह जांच एजेंसी के संस्करण पर उठाए गए संदेह की सत्यता या विश्वसनीयता की जांच नहीं कर सकती। अदालत ने यह भी कहा था कि आरोपी इस मुद्दे को मुकदमे की उचित अवस्था में उठा सकती है।

कलीता के वकील ने यह भी आरोप लगाया था कि जाफराबाद थाने में दर्ज एफआईआर से जुड़े इस मामले में आरोप तय करने के दौरान पुलिस ने केस डायरी में कुछ “एंटीडेटेड” बयान जोड़ दिए। इन बयानों के आधार पर आरोप लगाया गया कि आरोपी पुलिस के साथ “धक्का-मुक्की” की घटनाओं में शामिल थी।

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उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 24 फरवरी 2020 को नागरिकता कानून को लेकर समर्थकों और विरोधियों के बीच झड़पें शुरू हुई थीं, जो बाद में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा में बदल गईं। इस हिंसा में कम से कम 53 लोगों की मौत हुई थी और लगभग 700 लोग घायल हुए थे।

बाद में 15 जून 2021 को दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले से जुड़े यूएपीए प्रकरण में छात्र कार्यकर्ता नताशा नरवाल, देवांगना कलीता और आसिफ इकबाल तनहा को जमानत दे दी थी। उस आदेश में हाईकोर्ट ने कहा था कि असहमति को दबाने की कोशिश में राज्य ने विरोध के अधिकार और आतंकवादी गतिविधि के बीच की रेखा धुंधली कर दी है।

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हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि ऐसा दृष्टिकोण आगे बढ़ा तो यह लोकतंत्र के लिए “दुखद दिन” होगा। अदालत ने यूएपीए में “आतंकवादी कृत्य” की परिभाषा को “कुछ हद तक अस्पष्ट” बताते हुए इसके सावधानीपूर्वक उपयोग की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

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