परीक्षा में अशक्त लोगों की सहायता के लिए उचित दिशानिर्देश तैयार करें: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि केंद्र सरकार को परीक्षा में अशक्त व्यक्तियों के लिए उत्तर पुस्तिका में लिखने वाले व्यक्तियों की सुविधा प्रदान करने के नियमन के लिए दिशानिर्देश बनाने का निर्देश दिया। 

सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक न्याय एंव अधिकारिता मंत्रालय के इस विचार पर संज्ञान लिया कि कानून के अंतर्गत परिभाषित अशक्तता के साथ साथ अशक्त जनों को भी परीक्षा में लिखने वाला व्यक्ति मुहैया कराया जा सकता है। चूंकि गाइडलाइंस पूर्ण नही है। एमएसजेई अशक्त लोगों के कल्याण के लिए नोडल मंत्रालय है। 

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदिरा बनर्जी और संजीव खन्ना की संयुक्त पीठ ने कहा कि नोडल मंत्रालय के इस विचार से संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को अवगत नही कराया साथ ही दूसरी ओर यूपीएससी ने सिविल सेवा परीक्षा आयोजित करने के लिए केंद्र के कार्मिक एंव प्रशिक्षण विभाग के नियमो से स्वम को प्रतिबद्ध मानते हुए विशेष तौर से इस कोर्ट के समक्ष उल्लेख किया है कि अशक्तता के मापदंड को पूर्ण न करने वाला उम्मीदवार लिखने वाला व्यक्ति प्राप्त करने का हकदार नही होगा। 

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साथ ही कोर्ट के समक्ष केंद्र के दो मंत्रालयों ने अलग अलग विचार प्रस्तुत किए हैं जो दर्शाता है कि नीतिगत समरूपता नही है। पीठ ने कहा कि हमे बहुत चिंता के साथ यह कहना पड़ रहा है कि देश मे अशक्त जनों को प्रभावित करने वाले एक नीतिगत विषय पर दोनों को एक दूसरे के निर्णय का पता ही नही। 

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल सेवा परीक्षा के अभ्यर्थी और न्यूरोलॉजीकल विकार से पीड़ित युवक की याचिका पर एमएसजेई को अशक्त जन के अनुकूल कुछ निर्देश भी जारी किए। याची को परीक्षा में उत्तर पुस्तिका लिखने वाले व्यक्ति की सुविधा मुहैया कराने से इनकार कर दिया गया था। पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के निर्णय को खारिज करते हुए एमबीबीएस होल्डर विकास कुमार की अपील स्वीकार कर ली है। 

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