दिल्ली में स्कूल फीस नियमन कानून के क्रियान्वयन पर सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी, कहा- शैक्षणिक सत्र के बीच लागू करना “भ्रमपूर्ण”

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली स्कूल शिक्षा (शुल्क निर्धारण एवं विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम, 2025 को लागू करने की टाइमिंग पर सवाल उठाए हैं। न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराध्य की पीठ ने टिप्पणी की कि जब शैक्षणिक सत्र पहले से चल रहा हो, तब इस तरह का कानून लागू करना “भ्रमपूर्ण” और व्यवहारिक रूप से अव्यवस्थित हो सकता है।

यह टिप्पणी उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की गई जो निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों के संघों ने अधिनियम और उसकी नियमावली को चुनौती देते हुए दाखिल की थीं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि कानून को लागू करने का तरीका उसकी मूल योजना के विपरीत है और इससे स्कूलों की प्रशासनिक व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह के व्यापक बदलावों को सत्र के मध्य में बिना पर्याप्त संक्रमण अवधि के लागू करना अव्यवहारिक होगा।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर कानून पर रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन यह स्पष्ट किया कि इसका कार्यान्वयन विधिक समय-सीमा के अनुरूप ही होना चाहिए। पीठ ने कहा, “इस क्रियान्वयन में कुछ भ्रम नजर आ रहा है।”

दिल्ली स्कूल शिक्षा (शुल्क निर्धारण एवं विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम, 2025 निजी स्कूलों में शुल्क नियमन के लिए एक व्यापक ढांचा प्रदान करता है। यह कानून कैपिटेशन फीस पर प्रतिबंध लगाता है, किसी भी शुल्क वृद्धि के लिए पूर्व स्वीकृति को अनिवार्य करता है और शुल्क की विभिन्न श्रेणियों एवं लेखा-व्यवस्थाओं के बारे में पारदर्शिता सुनिश्चित करता है।

कानून के तहत प्रत्येक स्कूल में एक फीस नियमन समिति (Fee Regulation Committee) का गठन अनिवार्य है, जो प्रस्तावित शुल्क की समीक्षा करेगी और उसे अनुमोदन देगी।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 8 जनवरी को निजी स्कूलों को फीस नियमन समितियां गठित करने के लिए जारी अधिसूचना पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था, लेकिन समयसीमा बढ़ाते हुए समितियों के गठन की अंतिम तिथि 10 जनवरी से बढ़ाकर 20 जनवरी कर दी थी। साथ ही, स्कूल प्रबंधन द्वारा प्रस्तावित शुल्क जमा करने की अंतिम तिथि भी 25 जनवरी से बढ़ाकर 5 फरवरी कर दी गई थी।

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सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाएं इस अधिनियम को शिक्षा के अधिकार और स्कूलों की स्वायत्तता पर अनुचित हस्तक्षेप बताते हुए चुनौती देती हैं।

अब अगली सुनवाई उन प्रक्रियाओं की प्रगति के आधार पर होगी, जब तक स्कूल अपनी समितियों का गठन कर प्रस्तावित शुल्क प्रस्तुत नहीं कर देते।

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